वह कहानी जो मंदिर की दीवारें बताती हैं
यदाद्रि। तेलंगाना के नलगोंडा जिले में वह पावन पहाड़ी। पाँच नृसिंह रूपों का वह मंदिर जिसके बारे में हम पहले जान चुके हैं। ऋषि यदारिशि की तपस्या। हनुमान जी का मार्गदर्शन। पाँच स्वयंभू स्वरूपों का प्रकट होना।
किंतु उस कथा के बाद जो हुआ, वह उससे भी अधिक रोमांचक है। भगवान नृसिंह उस गुफा में प्रकट हो गए थे। किंतु फिर एक दिन वे अदृश्य हो गए।
और उन्हें खोजने की वह यात्रा जो एक जनजाति ने की, जो एक निष्ठावान स्त्री ने की, वह यात्रा आज भी इस मंदिर की सबसे गहरी परत में समाई है। आइए, यदाद्रि के उस दूसरे रहस्य को समझते हैं जो पहले कभी इस विस्तार से नहीं बताया गया।
चेंचु जनजाति और भगवान नृसिंह: वह सम्बन्ध जो रक्त से गहरा है
चेंचु जनजाति का विश्वास है कि भगवान नृसिंह ने "चेंचिता" नामक एक चेंचु कन्या से विवाह किया था। इसीलिए वे भगवान को "ओबलेसुडु" अर्थात अपना जीजा कहते हैं। यह विश्वास केवल मान्यता नहीं है। यह उस जनजाति की सामाजिक और आध्यात्मिक पहचान का आधार है।
यदाद्रि के स्थल पुराण के अनुसार, यदारिशि की तपस्या के बाद जब नृसिंह देव पाँच रूपों में प्रकट हुए, तब से चेंचु जनजाति के लोग उस गुफा में नृसिंह की उपासना करते थे। किंतु वे बहुत विद्वान नहीं थे और अनुचित विधि से पूजा करने लगे। इससे नाराज होकर भगवान नृसिंह उस पहाड़ी में चले गए।
यह दंड नहीं था। यह प्रतीक्षा थी। भगवान उस क्षण की प्रतीक्षा में थे जब उन्हें सही विधि से पूजा जाएगा।
— यदाद्रि स्थल पुराणवह खोज जो वर्षों तक चली: जब जनजाति ने पर्वत का कोना-कोना छाना
भगवान के अदृश्य होने के बाद चेंचु जनजाति ने उन्हें खोजना शुरू किया। वर्षों तक। बिना थके। उस पहाड़ी की हर गुफा। हर चट्टान। हर झाड़ी। किंतु भगवान नहीं मिले।
जनजाति निराश थी। उनका वह प्रभु जो उनका जीजा था, जो उनके परिवार का हिस्सा था, जिसकी उपासना पीढ़ियों से चली आ रही थी, वह कहाँ गया? यह खोज एक ऐसे भक्त की पीड़ा है जिसने अपने भगवान को खो दिया हो। और तब भगवान ने वह किया जो वे सदा करते हैं। उन्होंने उत्तर दिया।
वह स्वप्न जिसने इतिहास बदल दिया: एक स्त्री की निष्ठा
कई वर्षों की खोज के बाद भगवान नृसिंह ने उस जनजाति की एक निष्ठावान स्त्री को स्वप्न में दर्शन दिए। उन्होंने उसे एक बड़ी गुफा का मार्ग बताया जिसमें वे पाँच दिव्य स्वरूपों में प्रकट हुए थे।
वह स्त्री सामान्य थी। कोई ऋषि नहीं। कोई विदुषी नहीं। किंतु उसकी निष्ठा असाधारण थी। भगवान ने उसे स्वप्न में बुलाया। उन्होंने कहा: "मैं यहाँ हूँ।"
वह स्त्री जागी। उसने अपने लोगों को जगाया। वे उस गुफा की ओर चले जो वर्षों से झाड़ियों में छिपी थी। और गुफा में जो दृश्य था, उसने सबको निःशब्द कर दिया। पाँच दिव्य नृसिंह स्वरूप। स्वयंभू। उस गुफा की दीवारों में।
भगवान ने उसी निष्ठावान स्त्री को चुना जो वर्षों की पीड़ा के बाद भी अपने प्रभु पर विश्वास रखे थी।
— यदाद्रि की लोक-परंपरायह यदाद्रि का वह रहस्य है जो अधिकांश भक्तों को ज्ञात नहीं।
गंडबेरुंड नृसिंह: वह दरार जिसका रहस्य आज भी अनसुलझा है
यदाद्रि के पाँच स्वरूपों में सबसे रहस्यमय है गंडबेरुंड नृसिंह। हनुमान मंदिर के निकट एक लंबी क्षैतिज दरार है जिसे गंडबेरुंड नृसिंह का प्रकट होने का स्थान माना जाता है। यह दरार साधारण नहीं है।
गंडबेरुंड वह दुर्लभ स्वरूप है जिसमें दो मुख हैं। एक सिंह जैसा और एक जो उससे भी अधिक शक्तिशाली है। यह स्वरूप पूरे भारत में अत्यंत दुर्लभ है। और यदाद्रि में यह स्वरूप एक क्षैतिज पत्थर की दरार में है।
वह दरार कहाँ से आई? कब बनी? क्यों बनी? आज तक कोई उत्तर नहीं। भक्तों का विश्वास है कि जो इस स्थान पर सच्चे मन से इच्छा करे, वह पूर्ण होती है। वह दरार एक रहस्य है। और उस रहस्य के भीतर एक वरदान है।
वैद्य नृसिंह: वह चिकित्सक जो आज भी रोग हरता है
यदाद्रि में भगवान नृसिंह को वैद्य नृसिंह भी कहते हैं। अर्थात चिकित्सक नृसिंह। यह नाम कहाँ से आया?
यदारिशि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान नृसिंह ने केवल दर्शन नहीं दिए। उन्होंने यह भी वरदान दिया कि यहाँ आने वाले हर भक्त के कष्ट दूर होंगे। और उस वरदान में शारीरिक कष्ट भी सम्मिलित थे।
यदाद्रि के भक्त युगों से यह अनुभव करते आए हैं कि जो असाध्य रोग से पीड़ित होकर यहाँ सच्चे मन से प्रार्थना करता है, उसे कोई न कोई मार्ग मिलता है। यही कारण है कि यदाद्रि को "कलियुग वैकुण्ठ" भी कहते हैं। वैकुण्ठ वह स्थान है जहाँ कोई कष्ट नहीं। यदाद्रि वह स्थान है जहाँ कष्ट दूर होते हैं।
वह भगवान जो उस गुफा में पाँच रूपों में विराजमान हैं, वे आज भी सक्रिय हैं, सजग हैं और अपने भक्तों के चिकित्सक हैं।
यदाद्रि का नवनिर्माण: जब सरकार ने भगवान के लिए नई नगरी बनाई
2016 से 2022 के बीच तेलंगाना सरकार ने यदाद्रि का ऐसा भव्य पुनर्निर्माण करवाया जो दक्षिण भारत के मंदिर इतिहास में अद्वितीय है। पूर्णतः पाषाण से निर्मित यह मंदिर परिसर आगम शास्त्र के कठोर नियमों के अनुसार बना है।
किंतु एक बात आज भी वैसी ही है। वह प्राचीन गुफा। वे पाँच स्वयंभू स्वरूप। और वह क्षैतिज दरार जिसमें गंडबेरुंड हैं। नया भव्य मंदिर उस प्राचीन गुफा के चारों ओर बना है। जैसे एक आधुनिक नगर उस पुरानी गुफा की रक्षा कर रहा हो।
जो हजारों वर्ष पहले था, वह आज भी वैसा ही है। केवल उसके चारों ओर का संसार बदला है।
चेंचु जनजाति की वह परंपरा जो आज भी जीवित है
चेंचु जनजाति आज भी यदाद्रि से अपना विशेष सम्बन्ध मानती है। वे नृसिंह को अपना जीजा मानते हैं। वार्षिक उत्सव के अवसर पर वे विशेष वस्त्र और उपहार लेकर आते हैं। उनकी उपस्थिति से मंदिर का वह उत्सव पूर्ण होता है।
चेंचु जनजाति का यह विश्वास है कि "चेंचिता" ने उनसे यह वरदान लिया कि भविष्य में चेंचु स्त्रियाँ इतनी सुंदर नहीं होंगी कि देव या असुर उनका हरण करें। यह एक माँ की वह चिंता है जो अपनी जाति की अन्य बेटियों की रक्षा चाहती थी।
और इस प्रसंग में वह करुणा दिखाई देती है जो भगवान नृसिंह में भी है। उन्होंने चेंचु लक्ष्मी के उस निर्णय को स्वीकार किया। जो देवता मनुष्य की भावनाओं को इतनी गहराई से समझे, वह देवता केवल पूजनीय नहीं, मित्र भी है।
गुफा का वह रहस्य जो आज भी है
वह गुफा 12 फुट ऊँची और 30 फुट लंबी है। गुफा में प्रवेश करते ही ज्वाला नृसिंह का सर्प रूप और योगानंद नृसिंह योग मुद्रा में दिखाई देते हैं। मुख्य गर्भगृह में लक्ष्मी नृसिंह का रजत विग्रह है। और गर्भगृह के ऊपर एक विशाल झुकी हुई शिला छत की भाँति है।
वह शिला किसने रखी? किसने उसे इस प्रकार झुकाया कि वह छत बन जाए? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। प्रकृति ने उस गुफा को इस प्रकार निर्मित किया जैसे वह भगवान के निवास के लिए ही बनाई गई हो। और शायद वह इसीलिए बनाई गई थी।
पंचारात्र आगम: वह पूजा-पद्धति जो ऋषियों ने निर्धारित की
यदाद्रि में पूजा-पद्धति पंचारात्र आगम के अनुसार है। इस पूजा-विधान की स्थापना स्वर्गीय वंगीपुरम नरसिंहाचार्यलु ने की थी जिन्होंने यदागिरी सुप्रभातम्, प्रपत्ति, स्तोत्रम् और मंगलाशासनम् की रचना भी की।
वह पूजा जो अनुचित विधि से शुरू हुई थी और जिससे भगवान अदृश्य हो गए थे, वही पूजा आज शास्त्रीय विधि से होती है। और उस शास्त्रीय पूजा के कारण भगवान उस गुफा में स्थायी रूप से विराजमान हैं।
पूजा-पद्धति का महत्त्व यही है: वह भगवान और भक्त के बीच का वह सेतु है जो सही होने पर दोनों को जोड़ता है।
— यदाद्रि परंपराइस क्षेत्र से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: भगवान को छोड़ा नहीं जा सकता, खोया जा सकता है। चेंचु जनजाति ने भगवान को छोड़ा नहीं था। उन्होंने गलत विधि से पूजा की और भगवान अदृश्य हो गए। भक्ति की गहराई के साथ उसकी शुद्धता भी आवश्यक है।
दूसरी शिक्षा: भगवान सबसे निर्बल को चुनते हैं। वह स्त्री जिसे स्वप्न आया, वह जनजाति की एक साधारण सदस्य थी। भगवान ने उसे चुना। जो सबसे विनम्र हो, भगवान उसके सबसे निकट होते हैं।
तीसरी शिक्षा: वैद्य नृसिंह आज भी उपस्थित हैं। यदाद्रि में जो भी सच्चे मन से रोग-मुक्ति के लिए प्रार्थना करता है, वह आज भी उस वरदान का अधिकारी है जो यदारिशि को मिला था।
चौथी शिक्षा: जो खो जाए उसे खोजना बंद मत करो। चेंचु जनजाति ने वर्षों तक खोजा। अंत में भगवान स्वयं आए। जो सच्चे मन से खोजता है, वह पाता है।
उपसंहार: वह गुफा जो दो बार मिली
यदाद्रि की वह गुफा। पहली बार ऋषि यदारिशि को मिली जब हनुमान जी ने मार्ग दिखाया। दूसरी बार एक चेंचु स्त्री को मिली जब भगवान ने स्वप्न में बुलाया। और दोनों बार जो मिला, वह एक ही था।
वे पाँच दिव्य स्वरूप। वह गंडबेरुंड की दरार। वह झुकी हुई शिला। और वे भगवान जो आज भी वहाँ हैं। जो यदाद्रि जाता है, वह उन दोनों परंपराओं में सम्मिलित होता है। ऋषि की तपस्या की परंपरा। और एक साधारण स्त्री की निष्ठा की परंपरा।
दोनों एक ही सत्य की ओर ले जाती हैं: भगवान नृसिंह उन सभी को दर्शन देते हैं जो सच्चे मन से उन्हें खोजते हैं।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।।
मैं उस उग्र, वीर, महाविष्णु स्वरूप नृसिंह देव को नमन करता हूँ, जो ज्वाला के समान चारों ओर से प्रकाशमान हैं, जो भयंकर होते हुए भी कल्याणकारी हैं, और जो मृत्यु के भी मृत्यु स्वरूप हैं।
यह लेख श्री लक्ष्मी नृसिंह स्वामी देवस्थानम् यदाद्रि (yadagiriguttatemple.telangana.gov.in), स्कंद पुराण, Castes and Tribes of Southern India (Edgar Thurston), srinarasimhakutumbam.org तथा hindupad.com के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित है।