Dharma नृसिंह तीर्थ स्कंद पुराण तेलंगाना

यदाद्रि का रहस्य —
वह गुफा जहाँ नृसिंह पाँच रूपों में प्रकट हुए

त्रेतायुग से चली आ रही वह अलौकिक कथा — जब ऋष्यशृंग-पुत्र यदारिशि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान नृसिंह ने एक साथ पाँच दिव्य स्वरूपों में दर्शन दिए।

25 मई 2026 ✍️ Dharma Yatra ⏱ 12 मिनट पठन

तेलंगाना के नलगोंडा जिले में एक पहाड़ी है। साधारण दिखती है। चारों ओर शुष्क भूमि। दूर-दूर तक कोई बड़ी नदी नहीं। कोई विशाल वन नहीं। किंतु इस साधारण पहाड़ी के भीतर एक ऐसी गुफा है, जिसका रहस्य स्कंद पुराण ने हजारों वर्ष पहले लिख दिया था।

उस गुफा में भगवान नृसिंह ने एक साथ पाँच रूपों में दर्शन दिए। एक नहीं। दो नहीं। पाँच।

यह स्थान है: यदाद्रि। यदागिरिगुट्टा। जिसे आज पंच नृसिंह क्षेत्र कहते हैं।

और इस क्षेत्र की कथा केवल एक मंदिर की कथा नहीं है। यह उस ऋषि की कथा है जिसके पिता की कथा स्वयं महाभारत में है। यह उस जनजाति की कथा है जो वर्षों तक अपने प्रभु को खोजती रही। यह उस स्वप्न की कथा है जिसमें भगवान ने एक साधारण स्त्री को दिशा दी।

और यह उस गुफा की कथा है जिसमें आज भी, हर दिन, पाँच हजार से आठ हजार भक्त नृसिंह के उन पाँच स्वरूपों का दर्शन करते हैं।

— यदागिरिगुट्टा स्थल पुराण

यदारिशि: वह ऋषि जिसके पिता की कथा महाभारत में है

यह कथा त्रेतायुग की है। स्कंद पुराण में वर्णित है कि इस पहाड़ी पर एक ऋषि तपस्या करने आए। उनका नाम था: यदारिशि।

किंतु यदारिशि का परिचय जानना आवश्यक है, क्योंकि उनका वंश स्वयं असाधारण था। यदारिशि के पिता थे: महर्षि ऋष्यशृंग।

और ऋष्यशृंग कोई साधारण ऋषि नहीं थे। वे वही महर्षि हैं जिनके यज्ञ से राजा दशरथ को पुत्र-प्राप्ति हुई थी। जिस पुत्रेष्टि यज्ञ से भगवान राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ, वह यज्ञ ऋष्यशृंग ने ही करवाया था।

अर्थात यदारिशि उस महर्षि के पुत्र थे, जिन्होंने भगवान राम के अवतरण का मार्ग प्रशस्त किया था। यह वंश ही बताता है कि यदारिशि की भक्ति कितनी गहरी रही होगी।

यदारिशि की माता थीं: शांता देवी। राजा दशरथ की पुत्री, जो ऋष्यशृंग को ब्याही थीं। इस वंश में जन्मे यदारिशि भोगीर और रायगिरी के बीच की इस पहाड़ी पर आए। यहाँ एक गुफा में उन्होंने तपस्या का संकल्प लिया।

हनुमान जी का मार्गदर्शन: जब भगवान ने स्वयं ऋषि को पथ दिखाया

स्कंद पुराण और यदागिरिगुट्टा के स्थल पुराण में एक विशेष प्रसंग वर्णित है। जब यदारिशि इस क्षेत्र में आए, तब स्वयं श्रीमन्नारायण ने उनकी तपस्या की निष्ठा देखकर हनुमान जी को भेजा।

हनुमान जी ने यदारिशि का मार्गदर्शन किया। उन्होंने ऋषि को वह पवित्र स्थान दिखाया जहाँ भगवान लक्ष्मीनृसिंह के स्वरूप में प्रकट थे।

यह स्थान आज भी विद्यमान है। पहाड़ी के तल पर, वर्तमान मुख्य मंदिर से लगभग पाँच सौ मीटर की दूरी पर, वह प्रथम स्थान है जहाँ यदारिशि ने नृसिंह का प्रथम दर्शन किया। वहाँ आज भी एक मंदिर है।

राम के अवतरण का मार्ग प्रशस्त करने वाले ऋष्यशृंग के पुत्र को, नृसिंह के दर्शन के लिए, राम के परम भक्त हनुमान ने मार्ग दिखाया। मानो दोनों अवतारों की कृपा-धारा यहाँ मिलती है।

— स्कंद पुराण

वह क्षण जो इतिहास में अमर हो गया: पाँच रूपों का प्रकट होना

यदारिशि की तपस्या की दीर्घता और गहराई को शब्दों में नहीं मापा जा सकता। वर्षों की साधना। एकाग्र चित्त। हर श्वास में नृसिंह का स्मरण।

और तब भगवान नृसिंह प्रकट हुए। किंतु एक रूप में नहीं। पाँच रूपों में। एक साथ। एक ही गुफा में। एक ही भक्त के सामने।

श्री ज्वाला नृसिंह: अग्नि के समान तेजस्वी, उग्र, भयंकर। वह रूप जो अधर्म को भस्म कर देता है।

श्री योगानंद नृसिंह: शांत, ध्यानमग्न, योग की मुद्रा में। वह रूप जो साधकों को आशीर्वाद देता है।

श्री गंडबेरुंड नृसिंह: दो मुख वाला अत्यंत दुर्लभ स्वरूप। गंडबेरुंड अर्थात वह जिसके दो सिंह-मुख हैं। यह स्वरूप केवल यदाद्रि में ही दर्शनीय है।

श्री उग्र नृसिंह: पराक्रम और वीरत्व का स्वरूप। शत्रुओं का संहार करने वाला।

श्री लक्ष्मी नृसिंह: माता लक्ष्मी के साथ विराजित, करुणामय, भक्तों को वर देने वाला।

यदारिशि ने यह अलौकिक दृश्य देखा और साष्टांग प्रणाम किया। फिर उन्होंने भगवान से एक ही प्रार्थना की: "प्रभु, इस पर्वत पर इन्हीं पाँच रूपों में सदा के लिए निवास करें।"

भगवान ने स्वीकार किया। और उसी दिन से यह पर्वत "यदागिरिगुट्टा" कहलाया। यदा का गुट्टा अर्थात यदारिशि का पर्वत।

सबसे रहस्यमय बात: जब भगवान पर्वत में छिप गए

यदारिशि ने वर्षों तक उस स्थान पर उपासना की। और एक दिन वे मोक्ष को प्राप्त हुए। उनके जाने के बाद एक जनजाति को उस क्षेत्र में भगवान की उपस्थिति का ज्ञान हुआ। वे लोग उपासना करने लगे।

किंतु स्कंद पुराण और यदागिरिगुट्टा का स्थल पुराण एक हृदयस्पर्शी प्रसंग बताता है। वह जनजाति उपासना तो करती थी, किंतु शास्त्र-सम्मत विधि से नहीं। उनकी भक्ति सच्ची थी, किंतु पूजा-पद्धति उचित नहीं थी।

और तब भगवान लक्ष्मीनृसिंह ने एक अद्भुत कार्य किया। वे पर्वत के भीतर चले गए। प्रकट से अप्रकट। दृश्य से अदृश्य।

जनजाति के लोग चकित रह गए। उन्होंने अपने प्रभु को खोजा। वर्षों तक खोजा। पर्वत का कोना-कोना छाना। किंतु वे नहीं मिले। यह खोज वर्षों तक चली।

और तब एक रात, उस जनजाति की एक निष्ठावान स्त्री को स्वप्न आया। भगवान नृसिंह स्वप्न में प्रकट हुए और बोले: "मैं पर्वत की उस बड़ी गुफा में हूँ। वहाँ आओ।"

वह स्त्री उठी। उसने अपने लोगों को जगाया। सब उस गुफा की ओर चले।

और गुफा में प्रवेश करने पर जो दृश्य था, उसने सबको निःशब्द कर दिया। भगवान नृसिंह पाँच दिव्य स्वरूपों में उस गुफा की दीवारों में स्वयंभू रूप से प्रकट थे। स्वयंभू। स्वतः प्रकट। किसी मानव हाथ से नहीं बने।

यह वही गुफा है जो आज इस मंदिर का गर्भगृह है।

पाँच रूपों का रहस्य: क्यों पाँच, क्यों एक साथ

यह प्रश्न स्वाभाविक है। अहोबिलम में नौ रूप हैं। यदाद्रि में पाँच क्यों? इसका उत्तर भगवान के स्वभाव में है। नृसिंह एकरूपी नहीं हैं। वे सर्वरूपी हैं।

वैष्णव शास्त्र बताते हैं कि भगवान विष्णु के प्रत्येक अवतार में अनेक भाव एक साथ होते हैं। उग्रता भी, करुणा भी। शक्ति भी, प्रेम भी।

यदारिशि ने जो माँगा वह यह था कि प्रभु के ये सभी भाव एक ही स्थान पर दर्शनीय हों। ताकि कोई भक्त जो शक्ति चाहे, उसे ज्वाला नृसिंह का आश्रय मिले। जो शांति चाहे, उसे योगानंद का। जो सांसारिक कल्याण चाहे, उसे लक्ष्मीनृसिंह का।

एक मंदिर। पाँच भाव। असंख्य भक्तों की असंख्य आवश्यकताएँ। यही यदाद्रि की विशेषता है।

— यदागिरिगुट्टा माहात्म्य

और गंडबेरुंड नृसिंह का स्वरूप तो विशेष रूप से उल्लेखनीय है। दो मुख वाला यह स्वरूप पूरे भारत में अत्यंत दुर्लभ है। यह स्वरूप उस शक्ति का प्रतीक है जो एक साथ दोनों दिशाओं में, दोनों लोकों में व्याप्त है।

वह रहस्य जो मंदिर के नीचे है: स्वयंभू गुफा

यदाद्रि मंदिर का जो सबसे रहस्यमय पक्ष है, वह है इसकी गुफा। यह गुफा किसी राजा ने नहीं बनवाई। किसी शिल्पी ने नहीं तराशी। यह प्राकृतिक गुफा है। और इसी गुफा की दीवारों में नृसिंह के पाँचों स्वरूप स्वयंभू रूप से प्रकट हैं।

स्वयंभू का अर्थ है: स्वयं प्रकट हुए। किसी मानव हाथ का स्पर्श नहीं। जब उस जनजाति की स्त्री स्वप्नादेश पाकर यहाँ आई, तो उसने इन प्रतिमाओं को पहले से ही यहाँ विद्यमान पाया। किसी ने बनाया नहीं था।

आज जब कोई श्रद्धालु उस गुफा में प्रवेश करता है, तो वह उसी प्राचीन गुफा में होता है जहाँ हजारों वर्ष पहले यदारिशि ने तपस्या की थी। वह गुफा आज भी वैसी ही है। वे स्वरूप आज भी वैसे ही हैं।

यदाद्रि और वैद्य नृसिंह: रोग-निवारण की अद्भुत मान्यता

यदाद्रि की एक और विशेषता है जो बहुत कम लोग जानते हैं। यहाँ भगवान नृसिंह को "वैद्य नृसिंह" भी कहते हैं। अर्थात चिकित्सक नृसिंह।

यह मान्यता युगों पुरानी है कि जो भक्त असाध्य रोगों से पीड़ित होकर यहाँ आता है और सच्चे मन से प्रार्थना करता है, उसे नृसिंह की कृपा से आरोग्य प्राप्त होता है।

ऋष्यशृंग के पुत्र यदारिशि ने जब इस भूमि पर तपस्या की, उन्होंने केवल दर्शन नहीं माँगा। उन्होंने यह भी माँगा कि यहाँ आने वाले हर भक्त को प्रभु का आशीर्वाद मिले। और भगवान ने वचन दिया।

इसीलिए आज भी प्रतिदिन पाँच हजार से आठ हजार भक्त यहाँ आते हैं। और उनमें से अनेक केवल तीर्थ-दर्शन के लिए नहीं, बल्कि प्रभु की कृपा पाने की आशा लेकर आते हैं।

इस कथा से क्या सीखें: चार शाश्वत शिक्षाएँ

पहली शिक्षा: उचित भक्ति-पद्धति का महत्त्व। जनजाति की भक्ति सच्ची थी, फिर भी भगवान अदृश्य हो गए। यह इसलिए नहीं कि उन्होंने दंड दिया। यह इसलिए था कि उचित विधि से उपासना न हो तो ईश्वर और भक्त के बीच का संवाद बाधित होता है। शास्त्र-सम्मत भक्ति केवल परंपरा नहीं, वह वह मार्ग है जो भगवान तक सीधे पहुँचाती है।

दूसरी शिक्षा: वंश का संस्कार साधना में उतरता है। यदारिशि के पिता ऋष्यशृंग ने राम के अवतरण का मार्ग बनाया। उनके पुत्र ने नृसिंह के पाँच रूपों का प्रकट होना संभव किया। भक्ति और साधना के संस्कार वंश में प्रवाहित होते हैं।

तीसरी शिक्षा: भगवान स्वप्न में भी मार्ग दिखाते हैं। वह जनजाति की स्त्री कोई विदुषी नहीं थी। किंतु उसकी निष्ठा सच्ची थी। भगवान ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और गुफा का मार्ग बताया। भगवान किसी का भी माध्यम बना सकते हैं। आवश्यकता केवल निष्ठा की है।

चौथी शिक्षा: हर भक्त की आवश्यकता के लिए एक रूप। पाँच रूपों का एक ही स्थान पर होना यह बताता है कि नृसिंह किसी एक भाव तक सीमित नहीं हैं। जो जिस भाव से आता है, उसे वह रूप मिलता है।

आज का यदाद्रि: प्राचीन गुफा, नवीन भव्यता

वर्ष 2016 से 2022 के बीच तेलंगाना सरकार ने यदाद्रि मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार करवाया। पूर्णतः पाषाण से निर्मित यह मंदिर परिसर आगम शास्त्र के अनुसार बना है।

किंतु एक बात नहीं बदली। वह प्राचीन गुफा आज भी वैसी ही है। वे स्वयंभू पाँचों स्वरूप आज भी वैसे ही हैं। पंचारात्र आगम के अनुसार पूजा-विधि आज भी वैसी ही है।

हजारों वर्ष बाद भी, उस गुफा में वही दिव्य उपस्थिति है जो त्रेतायुग में थी।

उपसंहार: वह प्रश्न जो यदाद्रि पूछता है

यदारिशि ने एक असाधारण वरदान माँगा था। उन्होंने यह नहीं माँगा कि यह स्थान केवल उनके लिए विशेष हो। उन्होंने माँगा कि यहाँ आने वाले हर भक्त को नृसिंह की कृपा मिले।

यही कारण है कि भगवान ने वचन दिया: "यह पर्वत मेरा शाश्वत निवास होगा।" और आज लाखों भक्त उस वचन का प्रमाण हैं।

जो यदाद्रि जाता है, वह उसी गुफा में प्रवेश करता है जहाँ त्रेतायुग में यदारिशि की तपस्या फली थी। जहाँ जनजाति की एक स्त्री रात के अंधेरे में स्वप्नादेश लेकर आई थी। जहाँ भगवान ने पाँच रूपों में अपने आप को शाश्वत रूप से स्थापित किया था।

वह गुफा प्रतीक्षा करती है। और भगवान नृसिंह उसमें आज भी विराजमान हैं।

✦ नृसिंह स्तुति ✦
उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥

यह लेख स्कंद पुराण, यदागिरिगुट्टा स्थल पुराण तथा श्री लक्ष्मी नृसिंह स्वामी देवस्थानम् के प्रामाणिक स्रोतों पर आधारित है।

ॐ नमो भगवते नृसिंहाय
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