सतयुग में पर्वतों के पंख होते थे। यह कोई कल्पना नहीं। यह ब्रह्म पुराण में वर्णित सत्य है। उस युग में पर्वत एक स्थान से दूसरे स्थान पर उड़ सकते थे। वे आकाश में विचरण करते थे। जहाँ चाहते, वहाँ उतर जाते।
किन्तु उनकी इस स्वतंत्रता से देवता और ऋषि भयभीत रहते थे। क्योंकि उड़ता हुआ पर्वत किसी भी समय किसी भी स्थान पर गिर सकता था। तब देवराज इन्द्र ने अपने वज्र से पर्वतों के पंख काट दिए।
वह पर्वत जो उड़ता था — और जिसका पंख नृसिंह क्षेत्र बन गया
उसी काल में मलयगिरि पर्वत कन्याकुमारी से हिमालय की ओर उड़ रहा था। इन्द्र के वज्र से उसके चार पंख टूटकर धरती पर गिरे — चार अलग-अलग स्थानों पर।
पहला पंख गिरा: वेदाद्रि पर। दूसरा पंख गिरा: यदाद्रि पर। तीसरा पंख गिरा: मंगलगिरि पर। चौथा पंख गिरा: नंदगिरि पर।
जहाँ-जहाँ तुम्हारे पंख गिरे हैं, वे सब स्थान पवित्र हो जाएँगे। और उन सभी स्थानों पर मैं लक्ष्मी नृसिंह के रूप में विराजमान रहूँगा।
— भगवान विष्णु, मलयगिरि को वरदानआज चारों स्थानों पर श्री लक्ष्मी नृसिंह के मंदिर हैं। चारों आपस में जुड़े हुए हैं। एक पर्वत के चार पंख, चार दिव्य क्षेत्र। यह वेदाद्रि का महारहस्य है।
वेदाद्रि का अर्थ: वेदों का पर्वत
इस पर्वत का नाम वेदाद्रि क्यों पड़ा? इसके पीछे एक गहरा कारण है। ब्रह्म पुराण के अनुसार, इस पर्वत पर ऋषि कश्यप सहित सात ऋषियों — सप्तर्षियों ने सात यज्ञकुंडों में यज्ञ किए। वे सात ऋषि थे: कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज।
यज्ञ की पावन अग्नि से एक दिव्य प्रकाश उत्पन्न हुआ। वह प्रकाश उत्तर दिशा में पर्वत के शिखर की ओर बढ़ा और एक गुफा में प्रवेश कर गया। उसी गुफा में आज भगवान लक्ष्मी नृसिंह स्वामी विराजमान हैं।
चूँकि यहाँ वेदमंत्रों के साथ यज्ञ हुआ, और वेदों की शक्ति से नृसिंह प्रकट हुए, इसलिए यह पर्वत "वेदाद्रि" — वेदों का पर्वत — कहलाया। इस पर्वत को नृसिंहकोण्ड भी कहते हैं। कोण्ड का अर्थ तेलुगु में पहाड़ी होता है।
वह विग्रह जो स्वयंभू है: छह फुट ऊँचा, चतुर्भुज
वेदाद्रि के गर्भगृह में जो विग्रह है, वह स्वयंभू है। यह विग्रह छह फुट ऊँचा और चतुर्भुज है। दो हाथ अभय और वरद मुद्रा में हैं — जो रक्षा और आशीर्वाद के प्रतीक हैं। अन्य दो हाथों में शंख और चक्र हैं।
यह विग्रह किसी ने नहीं बनाया। यह स्वयं प्रकट हुआ। और ऋषि कश्यप ने उसी दिन इस विग्रह को यहाँ स्थापित किया जो अत्यंत शुभ था — वैशाख शुक्ल पूर्णिमा से पूर्व का वह दिन जब स्वाति नक्षत्र उदित था।
जो विग्रह स्वयंभू हो, जिसे ऋषियों ने स्थापित किया हो, और जिसकी पूजा-परंपरा हजारों वर्षों से अटूट हो — वह स्थान केवल मंदिर नहीं, एक जीवंत तीर्थ है।
— धर्म यात्राआज भी प्रत्येक मास के स्वाति नक्षत्र के दिन यहाँ विशेष अभिषेक होता है। वह परंपरा जो कश्यप ऋषि से आरंभ हुई, आज भी जीवित है।
सात यज्ञकुंड और सात सरोवर: वह रहस्य जो आज भी दिखता है
इस मंदिर की सबसे अद्भुत विशेषता यह है कि सप्तर्षियों के वे सात यज्ञकुंड आज सात पवित्र सरोवरों में परिवर्तित हो गए हैं। जहाँ हजारों वर्ष पहले यज्ञ की अग्नि जली थी, वहाँ आज जल है।
और यह जल साधारण नहीं है। शास्त्र और परंपरा कहती है कि इन सात सरोवरों में स्नान करने से भक्त शुद्ध होकर भगवान का दर्शन करने के योग्य बनता है। भक्त पहले इन सात सरोवरों में स्नान करते हैं, फिर पर्वत की चढ़ाई करके भगवान का दर्शन करते हैं।
अग्नि जल बन गई। यज्ञकुंड सरोवर बन गए। किन्तु उनकी पवित्रता वैसी ही है। यह प्रकृति का वह रूपांतरण है जो सतयुग से कलियुग तक एक अटूट सूत्र बनाए हुए है।
चेंचु लक्ष्मी: वह रहस्य जो वेदाद्रि को सबसे अलग बनाता है
वेदाद्रि की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि यहाँ भगवान नृसिंह की पत्नी के रूप में चेंचु लक्ष्मी की पूजा होती है। यह किसी और नृसिंह मंदिर में नहीं मिलता।
प्रह्लादोपाख्यानम् के अनुसार, हिरण्यकशिपु के वध के पश्चात भगवान नृसिंह इन वनों में विचरण कर रहे थे। चेंचु जनजाति की एक कन्या, जो अत्यंत पवित्र और समर्पित थी, उनसे मिली। उसकी भक्ति और निर्मल प्रेम देखकर भगवान ने उससे विवाह किया।
माता लक्ष्मी — जो वैकुण्ठ में भगवान की पत्नी हैं — और चेंचु लक्ष्मी — जो एक साधारण वन-कन्या थीं — दोनों नृसिंह को प्रिय हैं। भगवान जाति नहीं देखते। वे हृदय देखते हैं।
— वेदाद्रि स्थलपुराणचेंचु जनजाति आज भी इस मंदिर से अपना विशेष सम्बन्ध मानती है। वे इस मंदिर को अपना कुलदेवता मानते हैं।
अश्वत्थामा की गुफाएँ: वह रहस्य जो महाभारत से जुड़ा है
वेदाद्रि पर एक और रहस्य है जो इस क्षेत्र को और अद्भुत बनाता है। इस पर्वत पर कुछ गुफाएँ हैं जिन्हें "अश्वत्थामा की गुफाएँ" कहते हैं।
कथा यह है कि महाभारत के युद्ध के पश्चात जब अश्वत्थामा ने सोए हुए द्रौपदी के पुत्रों का वध किया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें शाप दिया: "तुम अमर रहोगे, किन्तु अपने पापों के प्रायश्चित्त के लिए युगों तक भटकते रहोगे।"
शाप के पश्चात अश्वत्थामा इन गुफाओं में आए और यहाँ तपस्या करने लगे। आज भी यह मान्यता है कि अश्वत्थामा यहाँ किसी अज्ञात रूप में विद्यमान हैं। एक अमर व्यक्ति। एक पर्वत। और नृसिंह का मंदिर। यह त्रिभुज आज भी इस क्षेत्र के रहस्य को जीवित रखता है।
श्रीराम ने यहाँ चरण रखे: वह सम्बन्ध जो रामायण से है
वेदाद्रि का सम्बन्ध रामायण से भी है। रामायण के अरण्यकाण्ड में उल्लेख है कि भगवान श्रीराम वनवास के दौरान इस स्थान पर आए थे। जिस भूमि पर भगवान राम ने चरण रखे हों, उस भूमि की पवित्रता का अनुमान लगाया जा सकता है।
और इस पर्वत पर भगवान वेंकटेश्वर के भी चरण पड़े हैं। परंपरा मानती है कि भगवान वेंकटेश्वर ने इस पर्वत के शिखर पर पाँव रखा था। इस प्रकार एक ही पर्वत पर राम, नृसिंह और वेंकटेश्वर तीनों की उपस्थिति है। यह विष्णु के अनेक अवतारों की पावन स्मृतियों का संगम है।
पल्लव राजा नृसिंहवर्मन: जिसने इस मंदिर का निर्माण करवाया
शिला-लेखों के अनुसार यह मंदिर 9वीं शताब्दी में पल्लव राजा नृसिंहवर्मन ने उस विग्रह के चारों ओर बनवाया जिसे ऋषि कश्यप ने स्थापित किया था। राजा का नाम भी नृसिंह था। और उन्होंने नृसिंह का मंदिर बनवाया। परंपरा में यह दैवीय संयोग माना जाता है।
बाद में रेड्डी राजवंश ने इस मंदिर के गोपुरम का निर्माण करवाया। मंदिर का विस्तार हुआ। किन्तु गर्भगृह वही रहा जो कश्यप ऋषि ने बनाया था।
संतान वृक्ष: वह वृक्ष जो निःसंतान दम्पतियों को वरदान देता है
वेदाद्रि में एक और रहस्यमय तत्त्व है। आदि लक्ष्मी मंदिर के निकट एक वृक्ष है जिसे संतान वृक्ष कहते हैं। मान्यता है कि जो निःसंतान दम्पति यहाँ आकर अपनी साड़ी का एक कोना फाड़कर उसमें अपनी प्रार्थना बाँधकर झूले के रूप में उस वृक्ष से लटका दें, उन्हें संतान का वरदान मिलता है।
यह परंपरा कितनी पुरानी है, कोई नहीं जानता। किन्तु प्रत्येक वर्ष सैकड़ों दम्पति यहाँ आते हैं। और उनमें से अनेक के जीवन में वह वरदान पूरा होता है। वृक्ष का वरदान भगवान का वरदान है। प्रकृति भी उनकी इच्छा का माध्यम बन जाती है।
एदुकोर्लु: वह उत्सव जब नृसिंह और रंगनाथ आमने-सामने आते हैं
वेदाद्रि की एक और विलक्षण विशेषता है जो पूरे भारत में अद्वितीय है। नेल्लोर के तल्पगिरि रंगनाथ स्वामी मंदिर के ब्रह्मोत्सव के समय वेदाद्रि के नृसिंह की शोभायात्रा भी निकाली जाती है। और दोनों देवता आमने-सामने आते हैं। इस मिलन को एदुकोर्लु कहते हैं।
एक ओर नृसिंह। दूसरी ओर रंगनाथ। दोनों विष्णु के भिन्न रूप। दोनों एक दूसरे के सामने। जब भगवान स्वयं अपने दो रूपों में आमने-सामने आते हैं, तो उस दृश्य में एक गूढ़ संदेश है: भेद केवल रूप में है, सत्ता एक ही है।
— धर्म यात्राइस क्षेत्र से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: विपत्ति भी वरदान बन सकती है। मलयगिरि के पंख कटे। यह उसके लिए विपत्ति थी। किन्तु उन्हीं पंखों से चार पवित्र नृसिंह क्षेत्र बने। जीवन में जो टूटता है, वह कभी-कभी कुछ और बनने के लिए टूटता है।
दूसरी शिक्षा: यज्ञ की अग्नि कभी व्यर्थ नहीं जाती। सप्तर्षियों का यज्ञ समाप्त हुआ। अग्नि बुझी। किन्तु वह यज्ञ भगवान नृसिंह के प्रकट होने का माध्यम बना। और वे यज्ञकुंड आज सात सरोवर बनकर भक्तों को पवित्र कर रहे हैं।
तीसरी शिक्षा: भगवान सभी के हैं। चेंचु लक्ष्मी एक साधारण वन-कन्या थीं। किन्तु भगवान ने उनसे विवाह किया। नृसिंह देव ने यह सिद्ध किया कि उनके लिए कोई जाति या कुल नहीं होता।
चौथी शिक्षा: प्रायश्चित्त का मार्ग सदा खुला है। अश्वत्थामा ने पाप किया। वे श्राप के साथ जी रहे हैं। किन्तु वे इसी पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं — भगवान नृसिंह के निकट। पाप कितना भी बड़ा हो, प्रायश्चित्त का मार्ग बंद नहीं होता।
उपसंहार: वह पंख जो नृसिंह क्षेत्र बन गया
वह पंख जो मलयगिरि से टूटकर यहाँ गिरा था। वह अग्नि जो सप्तर्षियों के यज्ञकुंड में जली थी। वह प्रकाश जो गुफा में प्रविष्ट हुआ था। और वह विग्रह जो आज भी उसी गुफा में विराजमान है। यह सब एक ही सत्य की अभिव्यक्तियाँ हैं।
भगवान नृसिंह किसी के लिए भी, किसी भी रूप में, किसी भी स्थान पर प्रकट हो सकते हैं। आवश्यकता केवल उस प्रेम की है जो सप्तर्षियों ने अपने यज्ञ में दिखाया था। वेदाद्रि आज भी उस प्रेम की स्मृति है।
जो यहाँ आता है, वह उन सप्तर्षियों की उस परंपरा का हिस्सा बन जाता है जिन्होंने सतयुग में इस पर्वत पर अग्नि जलाई थी। और भगवान तब भी आए थे। आज भी आते हैं।