वह आलिंगन जिसने एक पर्वत बना दिया
आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में पूर्वी घाट की एक सुरम्य घाटी है। घने वन। स्वच्छ जल के झरने। और उन झरनों के बीच एक पर्वत। वह पर्वत साधारण नहीं है।
ध्यान से देखने पर वह पर्वत दो विशाल शिलाओं के आलिंगन की भाँति दिखता है। जैसे दो प्राणी एक-दूसरे को थामे हुए हों। और इस आलिंगन के पीछे एक कथा है।
हिरण्यकशिपु के वध के बाद भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ। वे वनों में विचरण करते रहे। तब माता लक्ष्मी ने चेंचु लक्ष्मी नामक एक जनजातीय कन्या का रूप धारण किया और भगवान नृसिंह को इस स्थान पर आलिंगन किया। तेलुगु में आलिंगन को "पेनु वेसुकोनुटा" कहते हैं। इसीलिए यह स्थान "पेनुशिला" कहलाया जो बाद में पेंचालकोना बन गया।
उस आलिंगन के पश्चात भगवान नृसिंह ने माता चेंचु लक्ष्मी से विवाह किया और फिर स्वयं को एक विशाल शिला के रूप में प्रकट किया।
— पेंचालकोना स्थलपुराणवह शिला आज भी है। और वह झरना आज भी बहता है। और उसी विशाल शिला की गुफा में भगवान के वह स्वयंभू विग्रह आज भी विराजमान है। यह है: श्री पेनुशिला लक्ष्मी नृसिंह स्वामी मंदिर, पेंचालकोना। आइए, इस महारहस्य को समझते हैं।
पेंचालकोना नाम का रहस्य: एक आलिंगन से जन्मा नाम
इस स्थान के नाम में ही उसकी पूरी कथा समाई है। "पेनुशिला" की उत्पत्ति तेलुगु के उस शब्द से हुई है जिसका अर्थ है मुड़ी हुई या आपस में उलझी हुई शिला।
वह पर्वत जो दो शिलाओं के आपस में उलझने से बना। वह स्थान जहाँ चेंचु लक्ष्मी ने नृसिंह को आलिंगन किया। पेनु वेसुकोनुटा अर्थात आलिंगन। शिला अर्थात पत्थर। पेनुशिला अर्थात वह शिला जो आलिंगन का प्रतीक है।
पेंचालकोना पर्वत स्वयं दो परस्पर उलझी शिलाओं के रूप में दिखता है जो एक सिंह के मुख की भाँति प्रतीत होता है। इसीलिए इसे दिव्य माना जाता है।
प्रकृति ने स्वयं उस आलिंगन को पत्थर में अंकित कर दिया। और वह नाम "पेंचालकोना" आज भी उस क्षण की स्मृति है जब माता लक्ष्मी ने अपने प्रिय को थामा था।
वह मूल कथा जो यहाँ का आधार है: पेंचालकोना एक आलिंगन का साक्षी
जब भगवान नृसिंह इस क्षेत्र में विचरण कर रहे थे, तो उनके क्रोध से पक्षी भाग गए। किंतु चेंचु राजा की पुत्री चेंचु लक्ष्मी ने साहस किया। भगवान उनकी सुंदरता और साहस से मुग्ध हो गए। नृसिंह ने प्रसन्न स्वरूप धारण किया और उनसे विवाह किया। चेंचु लक्ष्मी के उस आलिंगन से वह उग्र स्वरूप शांत हो गया और एक सौम्य स्वरूप प्रकट हुआ।
यह कथा अहोबिलम और अन्य नृसिंह क्षेत्रों से मिलती-जुलती है। किंतु पेंचालकोना में एक विशेषता है। यहाँ वह आलिंगन का क्षण इतना असाधारण था कि भगवान ने स्वयं को शिला बना लिया। वे उस क्षण को अमर करना चाहते थे।
दो शिलाओं का वह आपस में उलझना ही भगवान नृसिंह और चेंचु लक्ष्मी के उस मिलन का प्रतीक है।
जो क्षण हृदय को छू जाए, भगवान उसे पत्थर में अमर कर देते हैं।
670 वर्ष पुरानी खोज: एक चरवाहा और एक रहस्यमय वृद्ध
इस मंदिर की ऐतिहासिक खोज लगभग 670 वर्ष पहले हुई। गोनुपल्लि गाँव का एक बोया चरवाहा जिसका नाम गोल्लाबोयाडु था, इस वन में अपनी गायें चरा रहा था। तभी एक वृद्ध व्यक्ति प्रकट हुआ। उसने चरवाहे को बताया कि भगवान नृसिंह स्वामी यहाँ शिला रूप में विद्यमान हैं।
चरवाहे ने संदेह किया और पलटकर देखा। वृद्ध स्वयं शिला बन रहे थे। चरवाहा घबरा गया। वह अपने गाँव भागा और लोगों को बताया। पहले किसी ने विश्वास नहीं किया।
कुछ समय बाद गाँव के मुखिया को उस स्थिति का स्वप्न आया और उन्होंने उस चमत्कार को सत्य माना। तब मुखिया ने मंदिर बनवाया और नियमित पूजा के लिए अर्चकों की नियुक्ति की।
यह कथा कितनी परिचित है। एक चरवाहा। एक वृद्ध जो शिला बन गया। एक स्वप्न। और एक मंदिर। यही वह परंपरा है जो यदाद्रि में थी, मट्टपल्ली में थी, कादिरी में थी।
भगवान सबसे पहले उन्हें दर्शन देते हैं जो उनसे सबसे कम अपेक्षा रखते हैं।
पर्वत की परिक्रमा और स्वर्ण-रजत छत्र: वह परंपरा जो रक्षा की स्मृति है
इस मंदिर में एक विशेष परंपरा है। भक्त पर्वत की गिरि परिक्रमा करते हैं। इसके पीछे एक कथा है: भैरवकोना नामक स्थान पर राक्षस ऋषियों को पीड़ित कर रहे थे। ऋषियों की प्रार्थना पर भगवान नृसिंह वहाँ पहुँचे और राक्षसों से युद्ध किया। जब भगवान राक्षसों का वध कर रहे थे, ऋषियों ने उनके ऊपर सम्मान के प्रतीक के रूप में छत्र धारण किया।
उसी स्मृति में भक्त आज भी भगवान को स्वर्ण और रजत छत्र अर्पित करते हैं। और वह गिरि परिक्रमा, पर्वत के चारों ओर घूमना, उन ऋषियों की उस श्रद्धा की स्मृति है जिन्होंने भगवान के ऊपर छत्र थामा था।
जो ऋषियों ने किया, वह भक्त आज भी करते हैं। परंपरा केवल रिवाज नहीं, स्मृति है।
कण्व महर्षि का तपोवन: वह इतिहास जो नदी के नाम में जीवित है
इस मंदिर के स्थलपुराण के अनुसार यह स्थान कण्व महर्षि के तपोवन के रूप में प्रसिद्ध था। वे यहाँ तपस्या करते थे। यहाँ से निकलने वाली नदी का नाम कांडलेरु है जिसे पहले कण्व येरु कहते थे। कण्व महर्षि के नाम पर।
कण्व महर्षि वही हैं जिनके आश्रम में शकुंतला का पालन-पोषण हुआ था। कालिदास के महाकाव्य अभिज्ञान-शाकुंतलम् की शकुंतला उन्हीं कण्व महर्षि की पालित पुत्री थी। उन्हीं महर्षि का तपोवन यहाँ था।
और उनके नाम की नदी आज भी बहती है। उस मंदिर के पास से होकर। उस झरने को जन्म देती है जो पेंचालकोना को प्रकृति का वरदान बनाता है।
ऋषियों की स्मृति नदियों में, नामों में और पत्थरों में जीवित रहती है।
नव नृसिंह क्षेत्रों में पेंचालकोना: वह स्थान जो सूची में है
पेंचालकोना नव नृसिंह क्षेत्रों में से एक है। नव नृसिंह क्षेत्र हैं: अहोबिलम, पेंचालकोना, कादिरी, सिंहाचलम, अंतर्वेदी, मंगलगिरि, वेदाद्रि, यदाद्रि और धर्मपुरी।
यह सूची महत्त्वपूर्ण है। पेंचालकोना उन नौ ऐतिहासिक नृसिंह क्षेत्रों में से एक है जिन्हें आंध्र-तेलंगाना की नृसिंह परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है। इन नौ क्षेत्रों में से हम अब तक अहोबिलम, कादिरी, सिंहाचलम, अंतर्वेदी, मंगलगिरि, वेदाद्रि और यदाद्रि को विस्तार से जान चुके हैं।
पेंचालकोना उस पवित्र नव नृसिंह परंपरा का वह सदस्य है जो अपनी नैसर्गिक सुंदरता और अनूठी कथा से अलग पहचान रखता है।
स्वयंभू विग्रह: वह शिला जो नृसिंह है
भगवान का स्वयंभू विग्रह छह फुट ऊँचा है और पहाड़ी के भीतर एक गुफा में स्थित है। दो शिलाएँ परस्पर उलझकर एक सिंह के मुख पर मानव के शरीर का स्वरूप बनाती हैं।
यह विग्रह किसी मूर्तिकार ने नहीं बनाया। प्रकृति ने दो शिलाओं को इस प्रकार उलझाया कि वे भगवान नृसिंह का स्वरूप बन गईं। और उसी स्वयंभू विग्रह के समीप माता चेंचु लक्ष्मी का अलग मंदिर है। और भगवान अंजनेय स्वामी का मंदिर मुख्य विग्रह के सामने है।
तीन दिव्य उपस्थितियाँ एक ही घाटी में। नृसिंह, चेंचु लक्ष्मी और हनुमान।
पेंचालकोना के झरने: वह प्रकृति जो तीर्थ बनाती है
पेंचालकोना की एक और विशेषता है जो इसे अन्य नृसिंह मंदिरों से अलग बनाती है। यहाँ के झरने। मंदिर के निकट ही पेंचालकोना झरने हैं। उनका जल वर्ष भर बहता है।
भक्त मंदिर दर्शन से पूर्व उन झरनों के जल में स्नान करते हैं। उस जल को पवित्र माना जाता है।
झरने का वह जल, वह घाटी की हवा, वे घने वन — यह सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जो मंदिरों के नगरी-वातावरण से सर्वथा भिन्न है। यहाँ आने वाला भक्त न केवल एक देवालय में जाता है, वह एक ऐसी प्रकृति में प्रवेश करता है जो स्वयं भगवान की उपस्थिति का विस्तार है।
प्रकृति जहाँ इतनी सुंदर हो, वहाँ भगवान का वास स्वाभाविक है।
सोलहवीं शताब्दी का मंदिर और चोल-पल्लव-विजयनगर की विरासत
इस मंदिर की वास्तुकला में चोल, पल्लव और विजयनगर राजवंशों का योगदान है। मंदिर का गर्भगृह और मुख मंडपम त्रेतायुग की वास्तुकला का प्रतिबिम्ब माना जाता है। यह मंदिर 16वीं शताब्दी में बना था।
किंतु वह स्वयंभू विग्रह उससे भी पुराना है। 670 वर्ष पहले उस चरवाहे ने जो शिला देखी, वह तब भी उतनी ही प्राचीन थी।
मंदिर 16वीं शताब्दी का। खोज 670 वर्ष पुरानी। और विग्रह सतयुग से। तीन कालों का यह मंदिर अपने आप में अद्वितीय है।
इस क्षेत्र से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: जो क्षण अमर होने योग्य है, भगवान उसे पत्थर बना देते हैं। चेंचु लक्ष्मी का आलिंगन। वह क्षण इतना असाधारण था कि भगवान ने स्वयं को शिला बना लिया। जीवन के जो क्षण सबसे प्रिय हों, वे हृदय की शिला में अमर हो जाते हैं।
दूसरी शिक्षा: जो पीड़ा में भी साहस रखे, भगवान उससे प्रेम करते हैं। जब सभी पक्षी भाग गए, चेंचु लक्ष्मी रुकी। उनके उस साहस ने भगवान को मुग्ध किया। जो संकट में भी भगवान के सामने खड़ा रहे, वह उनका प्रिय बनता है।
तीसरी शिक्षा: भगवान साधारण को भी असाधारण बना देते हैं। वह चरवाहा। वह वृद्ध जो शिला बन गया। वह मुखिया जिसे स्वप्न आया। तीनों साधारण थे। किंतु भगवान ने उन्हें इतिहास का हिस्सा बना दिया।
चौथी शिक्षा: प्रकृति भी भगवान की उपासना करती है। वे झरने, वह घाटी, वे वन — सब मिलकर उस स्वयंभू शिला के चारों ओर एक दिव्य वातावरण बनाते हैं। प्रकृति भी जानती है कि यहाँ कौन विराजमान है।
उपसंहार: वह शिला जो आलिंगन का प्रतीक है
पूर्वी घाट की उस घाटी में। झरनों के बीच। दो उलझी शिलाओं से बने उस पर्वत में। भगवान नृसिंह स्वयंभू रूप में आज भी विराजमान हैं। वह शिला जो कृतयुग से यहाँ है।
वह आलिंगन जिसने नृसिंह को शांत किया। वह मिलन जिसने एक पर्वत को जन्म दिया। वह विवाह जिसने एक जनजाति को भगवान का परिवार बनाया। यह सब आज भी उस शिला में समाया है।
जो भक्त उस घाटी में जाता है, झरने के जल में स्नान करता है और उस गुफा में प्रवेश करता है, वह उस आलिंगन के क्षण के निकट जाता है।
और वह शिला आज भी उस स्पर्श को धारण किए हुए है।
— पेनुशिला लक्ष्मी नृसिंह स्वामीनृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।।
मैं उस उग्र, वीर, महाविष्णु स्वरूप नृसिंह देव को नमन करता हूँ, जो ज्वाला के समान चारों ओर से प्रकाशमान हैं, जो भयंकर होते हुए भी कल्याणकारी हैं, और जो मृत्यु के भी मृत्यु स्वरूप हैं।
यह लेख spsnellore.ap.gov.in, grokipedia.com, hindugallery.com, penchalakona.co.in, travellerkaka.com तथा पेंचालकोना स्थलपुराण के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित है।