यह कहानी किसी पुराण में नहीं लिखी। यह किसी ऋषि की तपस्या का फल नहीं है। यह आज से कुछ दशक पहले की बात है — दक्षिण अफ्रीका की एक साधारण सड़क पर, एक साधारण वैष्णव परिवार में जन्मी एक पाँच वर्षीया बालिका के साथ।
और यह घटना इतनी असाधारण थी कि स्थानीय अखबारों ने इसे प्रकाशित किया। चिकित्सक हैरान रह गए। पुलिसकर्मी और नर्स ने उसी दिन से नृसिंह देव की भक्ति स्वीकार की।
यह घटना वैष्णव संन्यासी मधु चंद दास ने अपने सत्संग में सुनाई, जो स्वयं उस परिवार के संपर्क में थे। यह प्रसंग bhagavatam-katha.com पर भी प्रामाणिक रूप से प्रकाशित है।
वह बालिका: जिसे नृसिंह "शेर वाले भगवान" लगते थे
दक्षिण अफ्रीका में एक साधारण वैष्णव परिवार रहता था। उनकी पाँच वर्षीया पुत्री भगवान नृसिंह की अनन्य भक्त थी।
किंतु यहाँ "भक्त" शब्द का अर्थ वह नहीं जो हम सोचते हैं। इस बालिका ने कोई दीक्षा नहीं ली थी। कोई मंत्र-जाप की विधि नहीं जानती थी। शास्त्र नहीं पढ़े थे। वह केवल नृसिंह से प्रेम करती थी।
भगवान का वह आधे सिंह, आधे मानव का स्वरूप उसे अद्भुत लगता था। वह अपने खेल के साथियों को बताती थी: "मेरे भगवान बिल्कुल शेर जैसे दिखते हैं।" बच्चे उसे समझ नहीं पाते थे। किंतु वह बालिका प्रतिदिन अपने मन में उस स्वरूप से बातें करती थी।
भगवान के लिए यही पर्याप्त था। प्रेम युग नहीं देखता। शास्त्र-ज्ञान नहीं देखता। दीक्षा नहीं देखता। वह केवल हृदय देखता है।
— मधु चंद दास, वैष्णव संन्यासीवह दोपहर: जब एक पल में सब बदल गया
उस दिन बालिका सड़क के किनारे अपने साथियों के साथ गेंद खेल रही थी। खेल चल रहा था। हँसी थी। बचपन था।
तभी गेंद लुढ़की और सड़क पर चली गई। बालिका बिना सोचे गेंद के पीछे दौड़ी। उसे नहीं पता था कि एक भारी ट्रक तेज गति से उसी दिशा में आ रहा था।
घर की पहली मंजिल पर खड़े उसके पिता ने यह दृश्य देखा। उन्होंने चिल्लाया। किंतु बालिका ने नहीं सुना। उन्होंने पहली मंजिल की खिड़की से नीचे छलाँग लगा दी।
छलाँग लगाते ही उनके दोनों पाँव टूट गए। वे जमीन पर गिरे। उठ नहीं सके। और उसी क्षण उन्होंने देखा: ट्रक ने उनकी पुत्री को टक्कर मारी और वह बालिका बीस मीटर दूर जा गिरी।
एक पिता जिसके दोनों पाँव टूटे हों, जमीन पर पड़ा हो, और वह देखे कि उसकी बच्ची बीस मीटर दूर सड़क पर पड़ी है — यह क्षण शब्दों में वर्णित नहीं हो सकता।
वह जो किसी ने नहीं देखा, किंतु बालिका ने देखा
निकट ही एक पुलिस की गाड़ी थी। उन्होंने यह दुर्घटना देखी। नशे में धुत ट्रक चालक को पुलिस ने रोका। एम्बुलेंस बुलाई गई। किंतु निकटतम अस्पताल ने बालिका को लेने से मना कर दिया — उन्हें लगा कि इतनी गंभीर चोट का उपचार उनके पास संभव नहीं।
अंततः एक बड़े अस्पताल में ले जाया गया। पुलिसकर्मी स्वयं साथ गया। अस्पताल में मुख्य चिकित्सक ने तत्काल एक्स-रे का आदेश दिया।
परिणाम देखकर वे स्तब्ध रह गए। एक भी हड्डी नहीं टूटी थी। आंतरिक चोट का कोई चिह्न नहीं। वह बालिका जो बीस मीटर दूर जाकर गिरी थी, जिसे एक भारी ट्रक ने टक्कर मारी थी, उसके शरीर पर केवल एक हल्की खरोंच थी — कमर के पास।
चिकित्सक ने नर्स को डाँटा: "एक्स-रे गलत हुआ है। दोबारा लो।" दोबारा एक्स-रे हुआ। परिणाम वही था।
तब बालिका को होश आया। और उसने जो बताया, उसने उस अस्पताल के कक्ष में उपस्थित हर व्यक्ति को निःशब्द कर दिया।
बालिका ने क्या देखा: उसके अपने शब्दों में
बालिका ने कहा: "जब ट्रक मेरी ओर आ रहा था, मैंने अपने नृसिंह भगवान को पुकारा।"
उसने बताया — जैसे ही उसने पुकारा, उसने देखा कि एक विशाल, दिव्य आकृति प्रकट हुई। आधा सिंह, आधा मानव। उन्होंने उस बालिका को धरती से उठाया। उनके मुख पर मुस्कान थी। उन्होंने कहा: "घबराओ मत। तुम सुरक्षित हो।"
और फिर उन्होंने उस बालिका को सड़क के दूसरी ओर धीरे से रख दिया।
बालिका ने भगवान के स्वरूप का वर्णन किया: सुनहरे वस्त्र। तीखे नख।
वह खरोंच जो उसकी कमर पर थी, वह उन्हीं नखों के स्पर्श से हुई थी। यह खरोंच किसी दुर्घटना की नहीं थी। यह उस स्पर्श का चिह्न था।
चिकित्सक और नर्स की प्रतिक्रिया: जब विज्ञान के पास उत्तर नहीं था
चिकित्सक ने प्रारंभ में कहा: "यह आघात से उत्पन्न मतिभ्रम है।"
किंतु उनके पास एक प्रश्न का उत्तर नहीं था: यदि ट्रक ने टक्कर मारी, बालिका बीस मीटर दूर गई, तो एक भी हड्डी क्यों नहीं टूटी? वह खरोंच किस प्रकार की थी जो ट्रक की टक्कर से नहीं बन सकती थी?
चिकित्सक ने बालिका के माता-पिता से बात की। उन्होंने नृसिंह देव के विषय में बताया। बालिका की भक्ति के विषय में बताया।
चिकित्सक मौन रहे। नर्स की आँखें भर आईं। उस दिन के बाद वह चिकित्सक और वह नर्स, दोनों भगवान नृसिंह के भक्त बन गए। जो विज्ञान नहीं समझा सका, वह भक्ति ने समझा दिया।
पिता की व्यथा और भगवान की करुणा
इस प्रसंग में एक और पहलू है जो हृदय को छूता है। वह पिता जिसने अपनी पुत्री को बचाने के लिए पहली मंजिल से छलाँग लगाई और दोनों पाँव तुड़वा लिए, वह जमीन पर पड़ा था। वह उठ नहीं सका।
बाद में जब उसे ज्ञात हुआ कि उसकी पुत्री को भगवान नृसिंह ने स्वयं उठाकर दूसरी ओर रखा, तो उसके आँसू रुके नहीं।
एक पिता ने अपनी पुत्री के लिए सब कुछ दाँव पर लगाया। और एक और पिता ने भी यही किया। भगवान नृसिंह ने प्रह्लाद के लिए जो किया था, वही उन्होंने इस पाँच वर्षीय बालिका के लिए किया।
— मधु चंद दासयह घटना और भगवद्गीता का वचन
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के नवम अध्याय के बाईसवें श्लोक में कहा है:
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
जो भक्त एकाग्र मन से सदैव मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त भक्तों का योगक्षेम — अर्थात प्राप्ति और रक्षा — मैं स्वयं वहन करता हूँ।
वह बालिका "नित्ययुक्त" नहीं थी किसी विधि-विधान के अर्थ में। किंतु वह अनन्य थी। उसके मन में नृसिंह के अतिरिक्त कोई और नहीं था। और भगवान ने अपना वचन निभाया।
इस घटना से तीन शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: भक्ति की कोई आयु-सीमा नहीं। वह बालिका पाँच वर्ष की थी। न दीक्षा, न शास्त्र-ज्ञान, न कोई साधना-विधि। केवल सरल, निर्मल प्रेम। और भगवान उसके लिए प्रकट हुए। भगवान नृसिंह योग्यता नहीं देखते। वे हृदय की शुद्धता देखते हैं।
दूसरी शिक्षा: संकट में नाम ही पर्याप्त है। उस बालिका ने कोई लंबा मंत्र नहीं जपा। उसने बस पुकारा — एक बार, सच्चे मन से। यही "नृसिंह कवच" है जो शास्त्रों में वर्णित है: संकट में उनका स्मरण ही सुरक्षा है।
तीसरी शिक्षा: भगवान आज भी उतने ही सक्रिय हैं। यह घटना सतयुग में नहीं हुई। यह आधुनिक काल में हुई — उस दक्षिण अफ्रीका में जहाँ मंदिर नहीं, पहाड़ नहीं, पवित्र नदी नहीं। किंतु जहाँ एक पाँच साल की बच्ची के हृदय में प्रेम था, वहाँ नृसिंह आए।
उपसंहार: वह खरोंच जो प्रमाण है
उस बालिका की कमर पर एक खरोंच थी। चिकित्सक उसे समझ नहीं पाए। ट्रक की टक्कर उस प्रकार की खरोंच नहीं छोड़ती।
किंतु वह बालिका जानती थी। वह खरोंच उन नखों की थी जो संसार की दृष्टि में भयंकर हैं, किंतु अपने भक्त के लिए सबसे कोमल स्पर्श हैं।
वह खरोंच किसी दुर्घटना का चिह्न नहीं थी। वह उस क्षण का प्रमाण थी जब भगवान नृसिंह ने एक छोटी बच्ची को अपनी बाँहों में उठाया था।
और यदि आज भी कोई संकट में, एकांत में, अंधेरे में, सच्चे मन से पुकारे — तो वे आज भी आते हैं।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
मैं उन उग्र, वीर, महाविष्णु स्वरूप, ज्वलंत, सर्वव्यापी, भीषण किंतु कल्याणकारी नृसिंह को प्रणाम करता हूँ — जो मृत्यु के भी मृत्यु हैं।