वह स्वप्न जो स्वप्न नहीं था
एक भक्त ने लिखा: "वे बस चल रहे थे। मेरे पास। बिल्कुल किसी पिता की तरह। उन्होंने कुछ कहा। और मैं सुन रहा था।"
"जागने पर भी वह उपस्थिति बनी रही। जैसे वे अभी गए ही नहीं।"
यह अनुभव एक ऐसी भक्त का था जो भगवान नृसिंह के मंदिर में दर्शन करने के कुछ दिन बाद रात को सोई थी। और भगवान आए।
कुछ दिनों बाद एक अन्य भक्त पुजारी के कक्ष में आई और उसने एक स्वप्न के बारे में बताया जिसमें भगवान नृसिंहदेव उसके साथ बिल्कुल एक पिता की तरह चलते और बातें करते थे।
यह कोई असाधारण साधना का फल नहीं था। कोई दशकों की तपस्या नहीं। केवल एक दर्शन। और उस दर्शन के बाद आया वह स्वप्न जो स्वप्न नहीं था।
भगवान नृसिंह केवल उग्र नहीं हैं। वे पिता भी हैं।
वह भगवान जो हम नहीं जानते
हम नृसिंह को जानते हैं उनके उस स्वरूप से जो हिरण्यकशिपु का वक्षस्थल विदीर्ण कर रहा है। ज्वाला की भाँति तेजस्वी। नखों से लैस। क्रोध में।
किंतु उसी भगवान का एक और रूप है। एक स्वप्न में भगवान नृसिंहदेव एक पिता की तरह चलते और बातें करते थे। वे बिल्कुल सामान्य थे। जैसे कोई प्रिय परिजन।
यह रूप वही है जो प्रह्लाद ने देखा था। प्रह्लाद के लिए नृसिंह कोई भयंकर देव नहीं थे। वे उनके प्रिय, उनके रक्षक, उनके पिता समान थे।
और हजारों वर्ष बाद भी वे अपने भक्तों के स्वप्न में उसी रूप में आते हैं।
पहली घटना: वह रोग जो दर्शन के बाद उसी रात गायब हुआ
एक भक्त दो सप्ताह से एक गंभीर शारीरिक समस्या से पीड़ित थी जो उसे असम में देवता-विग्रह बनाने से रोक रही थी। उसे वहाँ जाने का काम मिला था और हवाई टिकट भी था। किंतु वह समस्या उसे जाने नहीं दे रही थी।
दो सप्ताह। चिकित्सकों के पास गई। कोई लाभ नहीं।
उस दिन वह नृसिंह मंदिर में दर्शन करने आई। तब एक अन्य भक्त ने उसे सुझाव दिया: "भगवान नृसिंहदेव आज तत्काल आशीर्वाद दे रहे हैं। क्यों न उनसे प्रार्थना करो?"
उस भक्त ने भगवान के सामने प्रार्थना की। कोई विधि-विधान नहीं। कोई पुजारी नहीं। केवल एक सरल प्रार्थना।
अगले दिन प्रातः वह भक्त उस पुजारी के पास आई और बोली: "आपका बहुत धन्यवाद। जब मैं कल मंदिर से घर पहुँची, मेरी समस्या पूर्णतः समाप्त हो गई थी।"
दो सप्ताह जो ठीक नहीं हुआ, वह एक दर्शन के बाद उसी रात ठीक हो गया।
भगवान नृसिंह के लिए दो सप्ताह और दो क्षण में कोई अंतर नहीं।
दूसरी घटना: वह स्वप्न जिसमें भगवान पिता बनकर आए
कुछ दिनों बाद एक अन्य भक्त। वह भक्त पुजारी के कक्ष में आई और उसने एक स्वप्न के बारे में बताया जिसमें भगवान नृसिंहदेव उसके साथ बिल्कुल एक पिता की तरह चलते और बातें करते थे।
यह स्वप्न असाधारण था। भगवान नृसिंह — वे जिनका नाम सुनकर असुर भी काँपते हैं — वे एक पिता की तरह चल रहे थे।
कोई उग्रता नहीं। कोई ज्वाला नहीं। कोई शस्त्र नहीं। बस एक पिता। अपनी पुत्री के साथ।
यह दृश्य हृदय को क्या देता है? वह आश्वासन जो कोई शब्द नहीं दे सकता।
मैं हूँ। तुम्हारे साथ। हमेशा।
— भक्त के स्वप्न में भगवान नृसिंहप्रह्लाद का वह सम्बन्ध जो यहाँ जीवित है
यह स्वप्न अकारण नहीं था। प्रह्लाद के लिए नृसिंह हमेशा पिता थे। उन्होंने भगवान को कभी भयंकर नहीं माना।
जब हिरण्यकशिपु ने पूछा: "वह विष्णु कहाँ है?" तब प्रह्लाद ने कहा: "वे मेरे हृदय में हैं। वे मेरे साथ हैं।"
यह सम्बन्ध था। पिता और पुत्री का सम्बन्ध। और वही सम्बन्ध हजारों वर्ष बाद भी उस भक्त के स्वप्न में जीवित था।
भगवान नृसिंहदेव उस भक्त के साथ एक पिता की तरह चले। बातें कीं। जैसे कोई प्रिय परिजन।
जो प्रह्लाद के लिए पिता थे, वे आज भी अपने भक्तों के लिए पिता हैं।
"तत्काल आशीर्वाद" की वह परंपरा
उस पहली घटना में एक वाक्य था जो ध्यान आकर्षित करता है। उस पुजारी ने कहा था: "भगवान नृसिंहदेव आज तत्काल आशीर्वाद दे रहे हैं।"
यह क्या था? यह उस पुजारी का अनुभव था। वर्षों की सेवा का अनुभव।
कुछ दिन ऐसे होते हैं जब भगवान की कृपा विशेष रूप से प्रवाहित होती है। जब मंदिर में एक विशेष दिव्यता होती है। उस दिन वह पुजारी जानता था।
और उसी ज्ञान से उसने उस पीड़ित भक्त को मंदिर में प्रार्थना करने के लिए कहा।
भगवान की कृपा सदा बहती है। किंतु जो उसे पहचाने, वह उसका लाभ उठा सकता है।
वह भय जो नृसिंह का नाम सुनकर आता है और वह प्रेम जो दर्शन के बाद
यहाँ एक विरोधाभास है जो इन दोनों घटनाओं को और गहरा बनाता है।
पहली बार जब कोई नृसिंह के बारे में सुनता है — वह उग्र स्वरूप, वे बड़े नख, वह हिरण्यकशिपु का वध — तो एक भय होता है।
किंतु जब कोई उनके मंदिर में जाता है, उनके सामने खड़ा होता है, उनसे प्रार्थना करता है — तब वह भय कहाँ जाता है?
भक्त के स्वप्न में भगवान नृसिंहदेव चलते-फिरते, बातें करते, बिल्कुल एक पिता की तरह थे। भय नहीं था। केवल प्रेम था।
जो भगवान भक्त की रक्षा के लिए उग्र हैं, वही भगवान भक्त के साथ होने पर कोमल हैं।
यही नृसिंह की सबसे बड़ी विशेषता है।
वह पुजारी जिसने इन घटनाओं को दर्ज किया
इन दोनों घटनाओं को एक पुजारी ने अपनी डायरी में दर्ज किया जो narasimhalila.wordpress.com पर प्रकाशित है।
यह एक ऐसे पुजारी का वृत्तान्त है जो नृसिंह मंदिर में वर्षों से सेवा करते रहे और उन्होंने जो चमत्कार देखे, उन्हें लिख दिया।
यह कोई बड़ा दावा नहीं है। कोई समाचार पत्र की खबर नहीं। कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं। बस दो साधारण भक्तों के साधारण अनुभव।
किंतु वे अनुभव उस सत्य को प्रकट करते हैं जो हजारों वर्षों से कहा जा रहा है:
भगवान नृसिंह अपने भक्तों को कभी अकेला नहीं छोड़ते।
इन घटनाओं से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: भगवान तत्काल भी आशीर्वाद दे सकते हैं। दो सप्ताह की समस्या एक दर्शन के बाद उसी रात गायब हुई। भगवान की कृपा का कोई समय-सारिणी नहीं है। वे जब चाहें, जितना चाहें, उतना दे सकते हैं।
दूसरी शिक्षा: भगवान स्वप्न में भी उतने ही वास्तविक हैं। वह स्वप्न जिसमें नृसिंह एक पिता की तरह चले, वह कोई मानसिक कल्पना नहीं थी। भगवान की उपस्थिति स्वप्न में भी उतनी ही वास्तविक होती है।
तीसरी शिक्षा: नृसिंह के दो रूप हैं — उग्र और कोमल। वे हिरण्यकशिपु के लिए उग्र थे क्योंकि वह अधर्मी था। वे प्रह्लाद के लिए पिता थे क्योंकि वह भक्त था। जो भगवान का भक्त हो, उसके लिए वे सदा कोमल हैं।
चौथी शिक्षा: सरल प्रार्थना पर्याप्त है। उस पीड़ित भक्त ने कोई विशेष मंत्र नहीं जपा। कोई विधि नहीं की। बस प्रार्थना की। और भगवान ने सुना।
उपसंहार: वह पिता जो कभी अनुपस्थित नहीं होता
उस भक्त के स्वप्न में भगवान नृसिंह चल रहे थे। उसके साथ। बातें कर रहे थे। जैसे एक पिता अपनी पुत्री के साथ करता है।
यह दृश्य — यह कोमल, शांत, प्रेममय दृश्य — नृसिंह के उस स्वरूप को दिखाता है जो शास्त्रों में तो है, किंतु जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं।
वे केवल उग्र रक्षक नहीं हैं। वे पिता भी हैं। और जो पिता की भाँति अपने पुत्र-पुत्रियों की रक्षा करता है, वह उनके स्वप्न में भी आता है।
उनके साथ चलता है। बातें करता है। और यह जताता है: "मैं हूँ। तुम्हारे साथ। हमेशा।"
— भक्त पुजारी का अनुभव-वृत्तान्तनृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।।
मैं उस उग्र, वीर, महाविष्णु स्वरूप नृसिंह देव को नमन करता हूँ, जो ज्वाला के समान चारों ओर से प्रकाशमान हैं, जो भयंकर होते हुए भी कल्याणकारी हैं, और जो मृत्यु के भी मृत्यु स्वरूप हैं।
यह लेख narasimhalila.wordpress.com पर एक नृसिंह मंदिर के पुजारी द्वारा प्रकाशित प्रत्यक्ष अनुभव-वृत्तान्त पर आधारित है। यह वृत्तान्त उन भक्तों के प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित है जिन्होंने स्वयं उस पुजारी को यह बताया।