वह आवाज जो एक बार सुनी तो जीवन भर नहीं भूलती
एक भक्त ने लिखा: "जब पुजारी ने वह शंख मुख में डाला और पानकम डालना शुरू किया, मैं बस खड़ा रहा। और तब वह आवाज आई।"
"गड़गड़... गड़गड़... गड़गड़।" "जैसे कोई वास्तव में पी रहा हो। मेरे रोंगटे खड़े हो गए। आँखें भर आईं। मुझे नहीं पता क्यों। बस इतना जान गया कि यह पत्थर नहीं है।"
यह अनुभव केवल एक भक्त का नहीं। मंगलगिरि के उस मंदिर में जब पानकम अर्पित किया जाता है, तो गले से स्पष्ट गड़गड़ाहट की आवाज आती है। जैसे कोई प्राणी तृप्त होकर पी रहा हो।
यह आवाज प्रतिदिन आती है। लाखों भक्तों के सामने। और इसे सुनकर आज तक जो भी वहाँ गया, वह कुछ न कुछ लेकर लौटा। यही मंगलगिरि का वह रहस्य है जो संसार में अद्वितीय है।
चार युगों में चार भेंट: वह परंपरा जो सृष्टि के साथ बदली
इस मंदिर की परंपरा के अनुसार भगवान ने प्रत्येक युग में अलग-अलग भेंट स्वीकार की। कृतयुग में मधु यानी शहद। त्रेतायुग में दूध। द्वापरयुग में घी। और कलियुग में पानकम अर्थात गुड़-जल।
यह परिवर्तन क्यों? इसमें एक गहरा अर्थ छिपा है। कृतयुग में सृष्टि सबसे पवित्र थी। शहद जो प्रकृति की सर्वोच्च मिठास है, उसे भगवान स्वीकार करते थे।
त्रेतायुग में दूध। शुद्ध, पौष्टिक, जीवनदायी। द्वापर में घी। यज्ञों का आधार। और कलियुग में पानकम। गुड़, जल, सोंठ और इलायची का वह साधारण मिश्रण जो कोई भी बना सकता है।
जैसे-जैसे युग बदला, भगवान ने अपनी भेंट को उस युग के मनुष्य की सामर्थ्य के अनुसार सरल किया।
— मंगलगिरि की परंपराकलियुग में जब जीवन कठिन है, जब समय कम है, जब संसाधन सीमित हैं — भगवान ने वह भेंट माँगी जो सबसे सरल है।
वह चमत्कार जो प्रतिदिन होता है: आधा क्यों वापस आता है
जब भक्त पानकम अर्पित करते हैं तो भगवान ठीक आधा पी लेते हैं। शेष आधा वापस आता है। यह कभी कम नहीं होता, कभी अधिक नहीं होता। सदा ठीक आधा।
यह "ठीक आधा" क्यों? इसमें एक संदेश है। भगवान नृसिंह ने नामुचि असुर का वध करने के पश्चात यहाँ शांत स्वरूप धारण किया। रक्त की बजाय गुड़-जल स्वीकार करने लगे। यह उनकी करुणा का प्रतीक है।
वे आधा लेते हैं और आधा लौटाते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि भगवान भक्त की भेंट का सम्मान करते हैं। वे सब नहीं लेते। वे भक्त को भी देते हैं।
भगवान और भक्त के बीच सब कुछ बँटता है।
वह एक भक्त जिसका अनुभव सबसे गहरा था
एक भक्त ने अपना अनुभव साझा किया जो isharethese.com पर प्रकाशित हुआ। वे मंदिर में शाम चार बजे के बाद पहुँचे। पानकम अर्पण का समय निकल चुका था। किंतु उन्होंने प्रसाद के रूप में पानकम का एक गिलास लिया।
वह पानकम जो भगवान के मुख से होकर आया था। उन्होंने लिखा: "वह पानकम पीकर लगा जैसे स्वर्ग का अमृत पिया। उस ठंडी, मीठी, सुगंधित तरल में कुछ था जो साधारण गुड़-जल नहीं हो सकता।"
और फिर उन्होंने वह लिखा जो सबसे महत्त्वपूर्ण था: "जब मैं उस बड़े खुले मुख के सामने खड़ा था, तो मुझे लगा जैसे भगवान देख रहे हैं। न केवल मुझे — बल्कि मेरे भीतर। उस क्षण मुझे अपनी सारी कमियाँ दिखाई दीं। और उसी क्षण वह भय भी गया।"
यह अनुभव शब्दों में पूर्णतः नहीं समझाया जा सकता। किंतु जो भी मंगलगिरि गया है, वह जानता है कि उस खुले मुख के सामने खड़े होने का क्या अर्थ है।
भगवान का वह खुला मुख केवल पानकम के लिए नहीं है। वह भक्त की पुकार के लिए भी खुला है।
वह रहस्य जो विज्ञान ने आधा सुलझाया
वैज्ञानिकों ने एक तथ्य बताया: विजयवाड़ा-गुंटूर क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील है। यह क्षेत्र कभी ज्वालामुखीय क्षेत्र था। गुड़ का जल सल्फर यौगिकों को निष्क्रिय करता है। इसलिए पानकम चढ़ाने से ज्वालामुखीय विस्फोट की संभावना कम होती है।
किंतु यह उत्तर अपूर्ण है। यह नहीं बताता कि गड़गड़ाहट की आवाज कहाँ से आती है। यह नहीं बताता कि ठीक आधा क्यों वापस आता है, पूरा क्यों नहीं। यह नहीं बताता कि इतने मीठे पेय के बावजूद एक भी चींटी क्यों नहीं आती।
वह आवाज, वह सटीक आधा और वह चींटी-मक्खी का अभाव — इन तीनों का मिलकर होना किसी प्राकृतिक व्याख्या से परे है।
विज्ञान ने आधा उत्तर दिया। शेष आधे का उत्तर श्रद्धा देती है।
ह्रस्व शृंगी की भक्ति: वह हाथी जो पर्वत बन गया
मंगलगिरि की पहाड़ी दूर से एक विशाल हाथी के समान दिखती है। इसके पीछे एक कथा है। राजा परियात्र के पुत्र ह्रस्व शृंगी शारीरिक विकलांगता से पीड़ित थे। वे अनेक तीर्थों पर गए। अंततः यहाँ आए और तीन वर्षों तक भगवान की तपस्या की।
जब उनके पिता उन्हें वापस ले जाने आए, तो ह्रस्व शृंगी ने हाथी का रूप धारण किया और भगवान का शाश्वत आवास बन गए। वह पर्वत जो हाथी की भाँति दिखता है, वह ह्रस्व शृंगी का शरीर है।
और उसी शरीर पर भगवान विराजमान हैं। ह्रस्व शृंगी ने अपना सम्पूर्ण जीवन भगवान की सेवा में अर्पित कर दिया।
जो भक्त अपना सब कुछ भगवान को दे दे, वह स्वयं भगवान का आवास बन जाता है।
प्रतिदिन 7000 शंख: वह सेवा जो अखंडित है
प्रतिदिन प्रातः 7 बजे से दोपहर 3:30 बजे के बीच भक्त पानकम अर्पित कर सकते हैं। उस समय में हजारों भक्त आते हैं। हर भक्त एक शंख पानकम अर्पित करता है।
और हर शंख पर वही होता है। वही आवाज। वही आधा। मंदिर में विशेष एनक्लोजर है जहाँ पानकम बड़े बर्तनों में तैयार रखा जाता है। प्रसाद के रूप में गिलासों और बोतलों में वितरित होता है। भक्त खाली बोतल लाकर घर के लिए प्रसाद ले जा सकते हैं।
वह प्रसाद जो भगवान के मुख से होकर आया। प्रतिदिन। बिना अपवाद के। हजारों वर्षों से।
उस चींटी की भविष्यवाणी: वह रहस्य जो भयावह है
मंगलगिरि मंदिर से जुड़ी एक असाधारण मान्यता है: जिस दिन चींटियाँ इस मंदिर में आएँगी, उस दिन संसार का अंत होगा।
यह मान्यता क्यों? क्योंकि यह मंदिर इतने मीठे पेय का स्थान है। इतना गुड़-जल। इतनी मिठास। और फिर भी एक भी चींटी नहीं। यह प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है।
और इसीलिए यह मान्यता है कि जब यह असाधारण बात सामान्य हो जाएगी, जब चींटियाँ आने लगेंगी, तब यह दिव्य कवच समाप्त हो जाएगा।
जब तक चींटियाँ नहीं आतीं, भगवान की वह असाधारण उपस्थिति यहाँ है।
इस घटना से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: भगवान सरल भेंट से प्रसन्न होते हैं। कलियुग में पानकम। गुड़, जल और इलायची। इससे सरल क्या होगा? भगवान को महँगे उपहार नहीं चाहिए। वे भाव देखते हैं।
दूसरी शिक्षा: भगवान लेते कम हैं, देते अधिक हैं। आधा लेते हैं, आधा लौटाते हैं। यह भगवान का स्वभाव है। भक्त जो देता है, भगवान उसे कई गुना करके लौटाते हैं।
तीसरी शिक्षा: भगवान की उपस्थिति का प्रमाण इंद्रियों से मिलता है। वह आवाज। वह आधा। वह चींटी का अभाव। ये तीन इंद्रियों के प्रमाण हैं। देखना, सुनना, स्पर्श करना। भगवान की उपस्थिति केवल विश्वास की बात नहीं, अनुभव की बात है।
चौथी शिक्षा: जो सब कुछ अर्पित करे, वह स्वयं पावन हो जाता है। ह्रस्व शृंगी ने अपना शरीर दिया। भगवान उस पर विराजमान हैं। जो अपना सब कुछ भगवान को दे दे, वह पवित्र हो जाता है।
उपसंहार: वह आधा पानकम जो प्रसाद बन जाता है
हर दिन। हजारों शंख। और हर शंख में वही क्षण। जब पानकम मुख में जाता है। वह आवाज आती है। और ठीक आधा वापस आता है।
भगवान नृसिंह ने नामुचि के वध के बाद यहाँ शांत स्वरूप धारण किया। रक्त की बजाय मिठास को अपनाया। वह मिठास आज भी है।
उस पानकम में जो भगवान के मुख से होकर आता है। उस प्रसाद में जो भक्त घर लेकर जाते हैं। उस आवाज में जो उनके गले से निकलती है।
और उस अनुभव में जो एक बार हुआ तो जीवन भर नहीं भूलता।
— मंगलगिरि पानकाला नृसिंह स्वामीनृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।।
मैं उस उग्र, वीर, महाविष्णु स्वरूप नृसिंह देव को नमन करता हूँ, जो ज्वाला के समान चारों ओर से प्रकाशमान हैं, जो भयंकर होते हुए भी कल्याणकारी हैं, और जो मृत्यु के भी मृत्यु स्वरूप हैं।
यह लेख panakalanarasimhaswamy.org, isharethese.com, thedailyjagran.com, hindu-blog.com, sanatanavibes.in तथा goamood.com के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित है।