वह पर्वत जो इच्छाएँ पूर्ण करता है
आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में एक पर्वत है। उस पर्वत का नाम ही एक वरदान है। "कोरु" तेलुगु में अर्थात इच्छा। "कोंडा" तेलुगु में अर्थात पहाड़।
कोरुकोंडा का अर्थ है: इच्छा-पूर्ण पहाड़। और उस पर्वत पर विराजमान भगवान नृसिंह अत्यंत करुणामय माने जाते हैं जो अपने भक्तों की प्रार्थनाएँ शीघ्र सुनते हैं और उनकी इच्छाएँ पूर्ण करते हैं।
किंतु इस पर्वत का इतिहास केवल इच्छाओं तक सीमित नहीं। यहाँ एक ऋषि ने तपस्या की। एक स्वयंभू विग्रह प्रकट हुआ। पाण्डव वनवास में यहाँ आए। गोदावरी का वह विशाल प्रवाह इस पर्वत के शिखर से दिखाई देता है। और 12वीं शताब्दी की वह चालुक्य वास्तुकला आज भी अपनी भव्यता में खड़ी है।
यह है: श्री लक्ष्मी नृसिंह स्वामी मंदिर, कोरुकोंडा। पूर्वी गोदावरी का वह तीर्थ जो अपनी दिव्यता में अद्वितीय है। आइए, इस रहस्य को समझते हैं।
पाराशर ऋषि की तपस्या: वह साधना जिसने पर्वत को पवित्र किया
ऋषि पाराशर ने इस पर्वत पर भगवान श्रीमन्नारायण के लिए गहरी तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने माता लक्ष्मी देवी के साथ नृसिंह स्वामी के रूप में दर्शन दिए। ऋषि के अनुरोध पर भगवान यहाँ स्वयंभू रूप में प्रकट हुए और अपनी पत्नी सहित इस पहाड़ी पर निवास करने लगे।
पाराशर ऋषि कोई साधारण ऋषि नहीं थे। वे वही पाराशर ऋषि हैं जिन्होंने विष्णु पुराण की रचना की। जिनके पुत्र वेद व्यास थे। जिनसे महाभारत और पुराणों की परंपरा आगे चली।
उन्हीं पाराशर ऋषि की तपस्या की भूमि यह पर्वत है। इसीलिए इस पर्वत को पाराशर गिरि, पाराशर शैल, वेदाद्रि, सुवर्ण गिरि, पारिजात गिरि और कोनागिरि भी कहते हैं।
पाराशर ऋषि ने इस पर्वत को न केवल पवित्र किया, बल्कि इसे उस ज्ञान-परंपरा से जोड़ा जिसने सम्पूर्ण वैष्णव साहित्य को जन्म दिया।
— कोरुकोंडा स्थल पुराणवह स्वयंभू विग्रह जो केवल 9 इंच का है
गर्भगृह में भगवान नृसिंह का विग्रह केवल 9 इंच ऊँचा है। वे माता लक्ष्मी देवी को अपनी गोद में लिए, पंचाभय मुद्रा में विराजित हैं। विग्रह में वीर रस दिखाई देता है। उनके मुख पर एक प्रमुख मूँछ है और नेत्र विशाल और भावपूर्ण हैं। उनके ऊपर पंच-फन आदिशेष है। दोनों ओर शंख और चक्र हैं।
केवल 9 इंच। किंतु उस 9 इंच के विग्रह की दिव्य उपस्थिति इतनी प्रखर है कि भक्त 615 सीढ़ियाँ चढ़कर उसके दर्शन के लिए आते हैं।
इस स्वयंभू विग्रह को 120 मीटर की ऊँचाई पर स्थापित किया जाना मानवीय सामर्थ्य से परे था। न वह विग्रह किसी ने बनाया, न किसी ने स्थापित किया। वह स्वयं प्रकट हुआ।
जो स्वयं प्रकट हो, उसकी शक्ति मानव-निर्मित से असंख्य गुना अधिक होती है।
और उस 9 इंच के विग्रह की वह विशेषता जो उसे और अद्वितीय बनाती है: भगवान यहाँ "सात्विक नृसिंह" के रूप में पूजित हैं। सात्विक नृसिंह अर्थात वह स्वरूप जो सत्व गुण से परिपूर्ण हो। शांत, ज्ञानमय और भक्तों के प्रति करुणामय।
दो मंदिर, एक पर्वत: वह विशेषता जो कोरुकोंडा को अलग बनाती है
कोरुकोंडा पहाड़ी पर भगवान नृसिंह के दो मंदिर हैं। एक पहाड़ी के शिखर पर जहाँ स्वयंभू नृसिंह स्वामी हैं। और एक पहाड़ी की तलहटी में जहाँ भी पाराशर ऋषि द्वारा प्रतिष्ठित विग्रह है।
यह विशेषता उल्लेखनीय है। एक ही पर्वत। दो मंदिर। दोनों में पाराशर ऋषि का योगदान। शिखर पर स्वयंभू। तलहटी पर प्रतिष्ठित।
जो भक्त पूर्ण श्रद्धा से आता है, वह दोनों मंदिरों में दर्शन करता है। और इस प्रकार एक ही यात्रा में दो प्रकार के नृसिंह का दर्शन मिलता है।
एक पर्वत, दो दर्शन, एक ही परम सत्ता।
पाण्डवों का आगमन: जब महाभारत के नायक यहाँ आए
पाण्डवों ने अपने अरण्यवास अर्थात वनवास काल में इस मंदिर में आकर भगवान नृसिंह की पूजा की। यह तथ्य इस मंदिर के इतिहास को एक नई गहराई देता है।
पाण्डव जो धर्म के प्रतीक हैं। युधिष्ठिर जो धर्मराज हैं। भीम जो बल के अवतार हैं। अर्जुन जो धनुर्धर हैं। नकुल और सहदेव जो अश्विनी कुमारों के पुत्र हैं।
वे 13 वर्षों के वनवास में यहाँ आए। और उन्होंने उस स्वयंभू नृसिंह को प्रणाम किया। यह वही परंपरा है जो सिंहाचलम में थी जहाँ भगवान राम ने पूजा की थी। जो कादिरी में थी जहाँ वेद व्यास ने गुरुकुल चलाया था।
महाकाव्यों के महानायक जब किसी स्थान पर पूजा करें, तो वह स्थान स्वयं महाकाव्य बन जाता है।
गोदावरी का वह मनोरम दृश्य: जब प्रकृति स्वयं दर्शन देती है
कोरुकोंडा पर्वत के शिखर से गोदावरी नदी का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। 615 सीढ़ियाँ चढ़कर जब भक्त शिखर पर पहुँचता है, तो दो दर्शन एक साथ मिलते हैं।
पहला दर्शन: गर्भगृह में भगवान का। उस 9 इंच के स्वयंभू नृसिंह का। दूसरा दर्शन: सामने विशाल गोदावरी का। वह नदी जो गंगा की तरह पूजनीय है। जो सम्पूर्ण आंध्र प्रदेश की जीवन-रेखा है।
गोदावरी को दक्षिण की गंगा कहते हैं। और उस दक्षिण गंगा का यह मनोरम दृश्य भगवान नृसिंह के दर्शन के बाद मिलता है।
भगवान का दर्शन और प्रकृति का दर्शन एक साथ। यह संयोग नहीं, भगवान का वह उपहार है जो इस स्थान को विशेष बनाता है।
12वीं शताब्दी की चालुक्य वास्तुकला: पत्थर में संगीत
मंदिर की दीवारों पर रामायण के दृश्यों का उत्कृष्ट शिल्पांकन है जो पूर्वी चालुक्य काल की असाधारण कारीगरी का प्रमाण है। पर्वत की ऊँचाई इतनी खड़ी है कि उसी से गाँव का नाम "कोरुकोंडा" पड़ा।
यह पर्वत जिस प्रकार खड़ा है, वह स्वयं एक आश्चर्य है। और उस खड़ी पहाड़ी पर 12वीं शताब्दी में जो मंदिर बना, वह पूर्वी चालुक्य स्थापत्य का एक उत्कृष्ट नमूना है।
मंदिर परिसर के चारों ओर और पर्वत के शिखर पर अनेक शिला-शासन उत्कीर्ण हैं। वे शिला-शासन उस मंदिर के उन संरक्षकों की स्मृति हैं जिन्होंने इस दिव्य स्थान को युगों-युगों तक जीवित रखा।
रामानुजाचार्य की परंपरा और पराशर भट्टार: वह सेवा जो आज भी जीवित है
इस मंदिर का प्रशासन पराशर भट्टार अर्थात पेरिय भट्टार द्वारा किया जाता है जो श्री रामानुजाचार्य के अनुयायी हैं।
पराशर भट्टार कोई और नहीं, वे रामानुजाचार्य के उन शिष्यों की परंपरा में हैं जिन्होंने श्री वैष्णव परंपरा को जीवित रखा। और वही परंपरा आज भी इस मंदिर की सेवा में है।
जिस परंपरा ने रामानुजाचार्य को जन्म दिया और जिसे रामानुजाचार्य ने आगे बढ़ाया, वह परंपरा आज भी इस पर्वत पर भगवान की सेवा कर रही है।
गर्भगृह में वह विशेष व्यवस्था: वह रात्रि सेवा जो अनोखी है
प्रतिरात्रि उत्सव मूर्ति के लिए पावलिम्पु सेवा अर्थात विधिवत शयन सेवा की जाती है। इसमें शयन मुद्रा में लक्ष्मी नृसिंह स्वामी की उत्सव मूर्ति को विराम दिया जाता है।
यह सेवा अत्यंत भावपूर्ण है। प्रत्येक रात भगवान को सुलाया जाता है। ठीक वैसे जैसे एक परिवार का प्रिय सदस्य रात को विश्राम करता है। और प्रातः उन्हें जगाया जाता है। उनके लिए भोग तैयार होता है। उनकी नित्य सेवा होती है।
यह सेवा-भाव भगवान और भक्त के उस सम्बन्ध का प्रतीक है जो परिवार के सदस्यों जैसा है।
इस क्षेत्र से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: जो पर्वत इच्छाएँ पूर्ण करता है, वह पर्वत ही भगवान है। कोरुकोंडा का नाम ही बताता है कि यहाँ भगवान इच्छाएँ पूर्ण करते हैं। किंतु इच्छाएँ वही पूर्ण होती हैं जो धर्म के अनुकूल हों। पाराशर ऋषि की इच्छा थी कि भगवान यहाँ स्थायी निवास करें। वह इच्छा पूर्ण हुई।
दूसरी शिक्षा: छोटे आकार में भी असीम शक्ति हो सकती है। वह 9 इंच का विग्रह। किंतु उसकी दिव्यता इतनी प्रखर कि 615 सीढ़ियाँ चढ़कर भक्त आते हैं। भगवान का आकार उनकी शक्ति का मापदण्ड नहीं।
तीसरी शिक्षा: विपत्ति में भी पूजा नहीं छूटनी चाहिए। पाण्डव वनवास में थे। 13 वर्षों का कठिन काल। किंतु उस काल में भी वे नृसिंह के दर्शन के लिए आए। जो विपत्ति में भी भगवान को याद रखे, वह उनका सबसे प्रिय है।
चौथी शिक्षा: ज्ञान और भक्ति साथ चलते हैं। पाराशर ऋषि जिन्होंने विष्णु पुराण लिखा, वे यहाँ तपस्या करने आए। ज्ञान की सर्वोच्च अभिव्यक्ति भक्ति में ही सम्पन्न होती है।
उपसंहार: वह पर्वत जो आज भी इच्छाएँ पूर्ण करता है
615 सीढ़ियाँ। एक-एक कदम। और शिखर पर वह 9 इंच का विग्रह।
पंचाभय मुद्रा में विराजित। माता लक्ष्मी गोद में। पंच-फन आदिशेष ऊपर। विशाल नेत्र और वह मूँछ जो वीर रस दिखाती है।
और उस गर्भगृह से बाहर निकलकर जब भक्त शिखर पर खड़ा होता है, तो सामने गोदावरी का वह विशाल, शांत, दिव्य प्रवाह। उस क्षण में दो महानताएँ एक साथ होती हैं।
एक वह नृसिंह जो 9 इंच के विग्रह में असीम हैं। और दूसरी वह गोदावरी जो शताब्दियों से बह रही है।
और यह पर्वत इन दोनों के बीच खड़ा है। इच्छाएँ पूर्ण करते हुए। युगों से।
— कोरुकोंडा लक्ष्मी नृसिंह स्वामीनृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।।
मैं उस उग्र, वीर, महाविष्णु स्वरूप नृसिंह देव को नमन करता हूँ, जो ज्वाला के समान चारों ओर से प्रकाशमान हैं, जो भयंकर होते हुए भी कल्याणकारी हैं, और जो मृत्यु के भी मृत्यु स्वरूप हैं।
यह लेख tirthayatra.org, eastgodavari.ap.gov.in, travelsetu.com तथा कोरुकोंडा मंदिर के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित है।