Dharma नृसिंह कादिरी रायलसीमा तीर्थ

कादिरी का महारहस्य —
वह वृक्ष जिससे नृसिंह प्रकट हुए

वह विग्रह जो अभिषेक के बाद प्रतिदिन पसीना बहाता है, और वह नगर जो भगवान विष्णु के चरण-चिह्न से बना।

📅 08 जुलाई 2026 ✍️ Dharma Yatra ⏱ 13 मिनट पठन

वह वृक्ष जिसकी जड़ों से भगवान प्रकट हुए

आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में एक नगर है। उस नगर का नाम उस वृक्ष के नाम पर रखा गया है जिसकी जड़ों से एक दिन भगवान स्वयं प्रकट हुए।

वह वृक्ष था: खड़री। जिसे कनारी वृक्ष या इंडियन मलबरी भी कहते हैं। और उस वृक्ष की जड़ों से प्रकट हुए: श्री लक्ष्मी नृसिंह स्वामी। आठ भुजाओं वाले। हिरण्यकशिपु की छाती विदीर्ण करते हुए। प्रह्लाद को समीप में लिए।

यह विग्रह स्वयंभू है। किसी ने नहीं बनाया। भगवान उस वृक्ष की जड़ों में से स्वयं प्रकट हुए। और इस मंदिर का एक ऐसा रहस्य है जो प्रतिदिन होता है। लाखों भक्तों के सामने। और जिसे विज्ञान आज तक नहीं सुलझा पाया।

प्रतिदिन अभिषेक के बाद भगवान के विग्रह से पसीना निकलता है। बार-बार पोंछने पर भी। फिर से निकलता है।

— कादिरी मंदिर परंपरा

यह है: श्री कादिरी लक्ष्मी नृसिंह स्वामी मंदिर। रायलसीमा का वह महातीर्थ जो तिरुपति के समकक्ष माना जाता है। आइए, इस महारहस्य को उसकी जड़ों से समझते हैं।

कादिरी नाम का रहस्य: तीन अर्थ, एक सत्य

इस नगर के नाम की उत्पत्ति के तीन स्रोत हैं।

पहला स्रोत: "का" का अर्थ है विष्णु पादम् अर्थात भगवान विष्णु के चरण-चिह्न। और "आद्रि" का अर्थ है पहाड़ी। अर्थात कादिरी का अर्थ है: वह पहाड़ी जहाँ भगवान विष्णु के चरण-चिह्न हैं।

दूसरा स्रोत: खड़री वृक्ष से "खड़री" और फिर "कादिरी।" वह वृक्ष जिसकी जड़ों से भगवान प्रकट हुए, उस वृक्ष के नाम पर यह नगर बसा।

तीसरा स्रोत: वेद व्यास ने यहाँ अपने शिष्यों को असुरों की जानकारी के बिना शिक्षा दी। इसीलिए यह स्थान "केदारण्यम्" कहलाया।

तीनों नाम एक ही सत्य की ओर इशारा करते हैं। यह भूमि ऋषियों की तपस्या से, भगवान के चरणों से और उस वृक्ष से अभिषिक्त है जिसमें भगवान ने अपना निवास बनाया।

हिरण्यकशिपु वध के बाद: जब प्रह्लाद ने यहाँ नृसिंह को शांत किया

हिरण्यकशिपु के वध के बाद भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ और वे वनों और पहाड़ियों में विचरण करते रहे। कादिरी के निकट स्थित स्थोत्राद्रि पहाड़ी पर प्रह्लाद ने देवताओं के साथ मिलकर भगवान नृसिंह से क्रोध शांत करने की प्रार्थना की। भगवान उनकी प्रार्थना से प्रसन्न हुए और इसी स्थान पर शांत हुए।

इसीलिए इस मंदिर को "प्रह्लाद सामेत नृसिंह स्वामी मंदिर" भी कहते हैं। यह प्रसंग अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। अहोबिलम में युद्ध हुआ। कादिरी में शांति आई। अहोबिलम में नृसिंह उग्र थे। कादिरी में वे शांत हुए। और उसी शांत होने के स्थान पर वे उस खड़री वृक्ष की जड़ों में विराजमान हो गए।

जहाँ भगवान का क्रोध समाप्त हुआ, वहाँ उनका प्रेम प्रकट हुआ।

— कादिरी स्थल पुराण

वह महारहस्य जो प्रतिदिन होता है: अभिषेक के बाद पसीना

प्रतिदिन अभिषेक के बाद भगवान नृसिंह के विग्रह से पसीना निकलता है। पुजारी इसे बार-बार पोंछते हैं किंतु पसीना फिर से प्रकट हो जाता है। यह रहस्य अद्वितीय है।

अभिषेक का अर्थ है स्नान। जब विग्रह को स्नान कराया जाता है, तब वह ठंडा होता है। सामान्य तर्क के अनुसार उसके बाद पसीना निकलने का कोई कारण नहीं। किंतु यहाँ होता है। प्रतिदिन। बिना अपवाद के।

विग्रह से निकलने वाला अभिषेक जल पवित्र माना जाता है और भक्त इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। वैज्ञानिकों ने इसे समझने का प्रयास किया। किंतु वे कोई स्पष्टीकरण नहीं दे पाए।

भगवान का विग्रह पसीना बहाता है। यह उस जीवंत उपस्थिति का प्रमाण है जो हजारों वर्षों से इस मंदिर में है।

भृगु ऋषि और उत्सव मूर्ति: वह प्रसंग जो इस मंदिर को अद्वितीय बनाता है

भगवान नृसिंह स्वामी ने स्वयं भृगु ऋषि को उत्सव मूर्तियाँ प्रदान कीं ताकि वे दैनिक अर्चना कर सकें। यह प्रसंग अत्यंत असाधारण है।

भृगु ऋषि जो सप्तर्षियों में एक हैं, जिनके वंश में परशुराम जन्मे, जिन्होंने भगवान विष्णु की छाती पर पाँव रखने का साहस किया था। उन्हीं भृगु ऋषि को भगवान ने स्वयं अपनी उत्सव मूर्तियाँ भेंट कीं।

चूँकि उन मूर्तियों की स्थापना वसंत ऋतु में हुई थी, इसलिए भगवान को यहाँ "वसंत वल्लभुडु" अथवा "वसंत माधवुलु" भी कहते हैं। और वे मूर्तियाँ बाद में भृगु तीर्थम् नामक जलाशय में मिलीं जब भगवान ने एक भक्त को स्वप्न में उनका स्थान बताया।

भगवान ने स्वयं मूर्तियाँ दीं। मूर्तियाँ जलाशय में छिप गईं। और फिर स्वप्न में भगवान ने उन्हें वापस करवाया। यह वही परंपरा है जो यदाद्रि में और मट्टपल्ली में भी थी। भगवान अपने भक्तों के पास स्वप्न में आते हैं।

वेद व्यास का गुरुकुल: जब ज्ञान को छिपाकर सुरक्षित किया गया

कादिरी के इस क्षेत्र में वेद व्यास ने अपने शिष्यों को असुरों की जानकारी के बिना शिक्षा दी। वे यहाँ इसलिए आए क्योंकि यह स्थान असुरों की पहुँच से दूर था।

वेद व्यास जिन्होंने महाभारत लिखा। जिन्होंने अठारह पुराणों की रचना की। जिन्होंने वेदों को चार भागों में विभाजित किया। उन्होंने इस भूमि को अपना गुरुकुल बनाया।

और वह गुरुकुल इसलिए यहाँ था क्योंकि यह स्थान पवित्र था, सुरक्षित था और भगवान नृसिंह की उपस्थिति से अभिषिक्त था। जहाँ वेद व्यास ने ज्ञान की शिक्षा दी, वह भूमि स्वयं ज्ञान-क्षेत्र बन गई।

अर्जुन की तपस्या और आठ तीर्थ: वह नदी जो सबको जोड़ती है

मद्दिलेरु नदी जिसे अर्जुन नदी भी कहते हैं, इसी के तट पर अर्जुन ने तपस्या की थी। यह नदी आठ पवित्र तीर्थों से होकर बहती है: श्वेत पुष्करिणी, भृगु तीर्थम्, शेष तीर्थम्, कुंती तीर्थम्, लक्ष्मी तीर्थम्, गंगा तीर्थम्, गरुड़ तीर्थम् और भवनासिनी तीर्थम्।

आठ तीर्थ। एक नदी। अर्जुन ने इसी नदी के तट पर तपस्या की। और उनकी तपस्या का फल उन्हें मिला। जो नदी इन आठ तीर्थों को जोड़ती है, उसके किनारे स्नान करने का माहात्म्य आठ तीर्थों के दर्शन के समान माना जाता है।

एक नदी में आठ तीर्थों का पुण्य। यही कादिरी की विशेषता है।

विग्रह का रहस्य: वह अदृश्य होना और पुनः प्रकट होना

वीर बुक्क रायलु ने खड़री वृक्ष की जड़ों से विग्रह को खोजा और 1274-1275 ईस्वी में मंदिर बनवाया। बाद में विग्रह मंदिर से अदृश्य हो गया। फिर अच्युत देवरायलु को भगवान ने स्वप्न में दर्शन दिए और स्थोत्राद्रि पहाड़ी की गुफाओं से विग्रह को लाने का आदेश दिया। 1545 ईस्वी में विग्रह पुनः मंदिर में स्थापित हुआ।

यह प्रसंग यदाद्रि से और मट्टपल्ली से कितना मिलता-जुलता है। भगवान प्रकट होते हैं। फिर अदृश्य हो जाते हैं। और फिर स्वप्न में आकर अपना स्थान बताते हैं। यह उनकी वह लीला है जो बार-बार दोहराई जाती है।

भगवान कभी पूर्णतः अदृश्य नहीं होते। वे केवल हमें खोजने के लिए प्रेरित करते हैं।

भारत का दूसरा सबसे बड़ा रथ: वह रथोत्सव जो लाखों को खींचता है

कादिरी में प्रतिवर्ष रथोत्सव मनाया जाता है। यह रथ भारत का दूसरा सबसे बड़ा रथ माना जाता है। इस पवित्र दिन भगवान लक्ष्मी नृसिंह की मूर्ति उस रथ पर विराजमान होती है और लाखों भक्त उसे खींचते हैं।

भारत का दूसरा सबसे बड़ा रथ। पहला स्थान पुरी के जगन्नाथ रथोत्सव का है। और दूसरा स्थान कादिरी का। यह तुलना इस मंदिर के महत्त्व को स्पष्ट करती है।

इस रथोत्सव में आसपास के सभी जिलों के साथ-साथ कर्नाटक और अन्य राज्यों से भी दो लाख से अधिक भक्त आते हैं। दो लाख भक्त। एक रथ। और वह भगवान जो खड़री वृक्ष की जड़ों से प्रकट हुए थे।

विजयनगर साम्राज्य का वह योगदान: इतिहास पत्थरों में

1509 में श्री कृष्णदेव राय ने रंग मंटपम् और आलवार मंदिर का निर्माण करवाया। 1545 में अच्युत देवराय ने पूर्व राज गोपुरम, विनायक मंदिर, कृष्ण मंदिर और राघवेंद्र वृंदावन बनवाया। 1569 में तिरुमल राय ने मंडप और पुष्करिणी बनवाई।

विजयनगर साम्राज्य के तीन महान शासकों का योगदान एक ही मंदिर में। कृष्णदेव राय जो विजयनगर के सबसे महान सम्राट थे। उनके वंशज अच्युत देवराय और तिरुमल राय। तीन पीढ़ियों ने इस मंदिर को सींचा।

1451 और 1529 में वेयी कल्ल मंटपम् (1000 स्तम्भ मंडप) और कोटई मंडप का निर्माण हुआ। 1642-1644 में छत्रपति शिवाजी ने महिषासुर मर्दिनी मंदिर बनवाया। और छत्रपति शिवाजी का नाम भी इस मंदिर के इतिहास में है।

यह मंदिर केवल एक धर्म की, एक राज्य की, एक युग की सम्पत्ति नहीं। यह सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक विरासत है।

इस क्षेत्र से चार शाश्वत शिक्षाएँ

पहली शिक्षा: भगवान वृक्ष की जड़ों में भी विराजमान हो सकते हैं। वह खड़री वृक्ष। उसकी जड़ों में भगवान। यह बताता है कि भगवान केवल मंदिरों में नहीं, प्रकृति के हर तत्त्व में हैं। जो उन्हें खोजे, वह हर स्थान पर पाए।

दूसरी शिक्षा: पसीना बहाना उपस्थिति का प्रमाण है। वह विग्रह जो अभिषेक के बाद पसीना बहाता है। यह बताता है कि भगवान उस विग्रह में जीवंत हैं। वे वहाँ हैं। सक्रिय हैं।

तीसरी शिक्षा: ज्ञान को सुरक्षित रखना भी भक्ति है। वेद व्यास ने यहाँ असुरों से छिपाकर शिक्षा दी। ज्ञान की रक्षा भगवान की सेवा है।

चौथी शिक्षा: भगवान बार-बार वापस आते हैं। विग्रह अदृश्य हुआ। भगवान ने स्वप्न में स्थान बताया। वे वापस आए। जो भगवान को छोड़ता है, वे उसे नहीं छोड़ते।

उपसंहार: वह वृक्ष जो आज भी मंदिर में है

वह खड़री वृक्ष। जिसकी जड़ों से सतयुग में भगवान नृसिंह प्रकट हुए थे। वह वृक्ष आज भी मंदिर परिसर में है। और उसकी जड़ों में वह स्थान आज भी पवित्र माना जाता है।

हजारों वर्ष पहले एक वृक्ष था। उसकी जड़ों में भगवान विराजमान थे। आज उस वृक्ष के चारों ओर एक भव्य मंदिर है। गोपुरम हैं। मंडप हैं। पुष्करिणी है।

किंतु उस मंदिर के केन्द्र में वही विग्रह है जो उन जड़ों से प्रकट हुआ था। और वह विग्रह आज भी प्रतिदिन अभिषेक के बाद पसीना बहाता है। जैसे भगवान कह रहे हों:

मैं यहाँ हूँ। मैं जीवित हूँ। मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ।

— कादिरी लक्ष्मी नृसिंह स्वामी
✦ नृसिंह ध्यान श्लोक ✦
उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्।।
भावार्थ —

मैं उस उग्र, वीर, महाविष्णु स्वरूप नृसिंह देव को नमन करता हूँ, जो ज्वाला के समान चारों ओर से प्रकाशमान हैं, जो भयंकर होते हुए भी कल्याणकारी हैं, और जो मृत्यु के भी मृत्यु स्वरूप हैं।

यह लेख ब्रह्माण्ड पुराण, templesinindiainfo.com, trawell.in, templepurohit.com, gotirupati.com, pilgrimaide.com तथा कादिरी मंदिर देवस्थानम् के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित है।

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