भगवान विष्णु के दस अवतार हैं। उन दस अवतारों में एक बार ऐसा हुआ जो न पहले हुआ था न बाद में होगा। एक अवतार ने दूसरे अवतार की तपस्या की। परशुराम जो स्वयं भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं, वे भगवान नृसिंह की तपस्या करने आए — उसी भगवान की तपस्या जो चौथे अवतार थे।
यह प्रसंग केवल एक स्थान पर है। अहोबिलम। भार्गव नृसिंह का मंदिर। और इस प्रसंग में एक और रहस्य है — जब परशुराम तपस्या कर रहे थे और भगवान नृसिंह ने दर्शन दिए, तो उस दर्शन के समय भगवान की गोद में हिरण्यकशिपु था। हिरण्यकशिपु ने परशुराम को देखा। और परशुराम ने भगवान से प्रार्थना की कि वे उसी रूप में सदा के लिए यहाँ विराजमान हों। यह है: श्री भार्गव नृसिंह स्वामी।
परशुराम: वह अवतार जिसने नृसिंह को पुकारा
परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं। वे भृगु वंश में जन्मे थे। इसीलिए उनका दूसरा नाम है: भार्गव राम — भृगु वंश के राम। और इसीलिए जब उनकी तपस्या से प्रकट होकर नृसिंह यहाँ विराजमान हुए, तो वे भार्गव नृसिंह कहलाए।
परशुराम ने नृसिंह की तपस्या क्यों की? उनके मन में एक गहरी अभिलाषा थी। जब सतयुग में हिरण्यकशिपु का वध हुआ था, परशुराम उस समय प्रकट नहीं हुए थे। वे त्रेतायुग के अवतार हैं। किंतु उनके हृदय में उस दिव्य क्षण का दर्शन करने की इच्छा थी। वह क्षण जब स्तम्भ फटा। जब नृसिंह प्रकट हुए। जब हिरण्यकशिपु की छाती विदीर्ण की गई।
वह तपस्या और वह असाधारण दर्शन
परशुराम ने अक्षय तीर्थ में स्नान किया और उस जल से भगवान नृसिंह की उपासना की। वे प्रतिदिन उस तीर्थ में स्नान करते। उस पवित्र जल से भगवान का अभिषेक करते। और फिर गहरी तपस्या में बैठ जाते।
और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान नृसिंह ने दर्शन दिए। भगवान की गोद में हिरण्यकशिपु था। उनके नख उसकी छाती में थे। वह उग्र, दिव्य, अलौकिक क्षण। जब भगवान दर्शन दे रहे थे, हिरण्यकशिपु जो उनकी गोद में था, उसने परशुराम की ओर देखा। यह एक असाधारण क्षण था।
परशुराम की प्रार्थना: जब एक अवतार ने दूसरे से माँगा
उस दर्शन के पश्चात परशुराम ने भगवान नृसिंह से प्रार्थना की कि वे उसी रूप में यहाँ सदा के लिए विराजमान रहें। भगवान ने वह प्रार्थना स्वीकार की।
और वह क्षण जो सतयुग में एक पल के लिए था, वह यहाँ अमर हो गया। आज जब कोई भक्त इस मंदिर में भार्गव नृसिंह का दर्शन करता है, तो वह उसी क्षण का दर्शन करता है जो परशुराम ने देखा था। एक ही दर्शन में तीन प्रसंग: शत्रु का वध, भक्त की रक्षा और परशुराम की अभिलाषा की पूर्ति।
— अहोबिलम स्थलपुराणभगवान के चार हाथ हैं। दो हाथों में शंख और चक्र हैं। और दो हाथ हिरण्यकशिपु के शरीर को विदीर्ण कर रहे हैं। हिरण्यकशिपु उनकी गोद में है। और प्रह्लाद उनके चरणों में है।
दशावतार उत्कीर्णन: वह रहस्य जो विग्रह के पीछे है
भार्गव नृसिंह के विग्रह की एक और असाधारण विशेषता है। विग्रह के पीछे की प्रभाई पर दशावतार उत्कीर्ण हैं — मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि।
परशुराम ने नृसिंह की तपस्या की। और इस मंदिर में नृसिंह के विग्रह के पीछे परशुराम सहित सभी दस अवतार उत्कीर्ण हैं। सभी अवतार एक दूसरे को प्रणाम कर रहे हैं। यह उस सत्य का प्रतीक है: भगवान के सभी अवतार एक ही परब्रह्म के विभिन्न रूप हैं।
अक्षय तीर्थ: वह सरोवर जहाँ परशुराम ने स्नान किया
मंदिर के निकट अक्षय तीर्थ है जिसे पुष्कर तीर्थ के समान पवित्र माना जाता है। परशुराम इसी कुंड में स्नान करते थे और इसी जल से भार्गव नृसिंह की पूजा करते थे।
जो भक्त इस सरोवर में स्नान करके भार्गव नृसिंह का दर्शन करता है, उसे भगवान लक्ष्मी करा का वरदान देते हैं — अर्थात वह हाथ जिसमें माता लक्ष्मी का आशीर्वाद हो। वह जल जिसमें परशुराम ने स्नान किया, वह जल आज भी भक्तों को पवित्र करता है।
वह गणिका जिसने दर्शन से पश्चाताप किया
भार्गव नृसिंह मंदिर के इतिहास में एक और प्रसंग है जो हृदय को छूता है। एक बार एक गणिका इस मंदिर में भार्गव नृसिंह का दर्शन करने आई। उस दर्शन ने उसके हृदय को परिवर्तित कर दिया। उसने अपने जीवन पर पश्चाताप किया और मंदिर के निकट एक तीर्थ का निर्माण करवाया।
उस गणिका ने कोई साधना नहीं की थी। कोई तपस्या नहीं की थी। वह तो केवल दर्शन करने आई थी। किंतु उस दर्शन की शक्ति ऐसी थी कि उसका जीवन बदल गया। भगवान की दृष्टि परिवर्तन का सबसे सरल मार्ग है।
— अहोबिलम माहात्म्य1500 वर्ष पुराना मंदिर: वह इतिहास जो शिलाओं में है
यह मंदिर 1500 वर्ष से भी अधिक पुराना है। 1500 वर्ष। तब से यह विग्रह यहाँ विराजमान है। तब से परशुराम की तपस्या का वह फल यहाँ अमर है।
मंदिर परिसर घने वन में है। ऊँचाई पर। पहुँचने के लिए खड़ी सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं। यह यात्रा कठिन है। किंतु जो पहुँचता है, वह 1500 वर्षों की उस परंपरा का हिस्सा बनता है जो परशुराम ने स्थापित की थी।
चैतन्य महाप्रभु के चरण चिह्न: वह स्मृति जो अमर है
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी दक्षिण भारत यात्रा के समय अहोबिलम की यात्रा की थी। उग्र स्तम्भ के शिखर पर उनके चरण चिह्न आज भी अंकित हैं।
चैतन्य महाप्रभु जो वैष्णव भक्ति परंपरा के महानतम आचार्यों में से एक हैं — जिनके भजन-कीर्तन की परंपरा आज भी सम्पूर्ण भारत और विश्व में जीवित है — उन्होंने इसी अहोबिलम में अपने चरण रखे। एक भक्त की स्मृति पत्थर में अमर हो जाती है।
अक्षय तीर्थ तीर्थस्तु भार्गवायास्तु मंगलम्॥
वह तपस्वी जिसका नाम भार्गव है, जो ध्यान में लीन रहते हैं, जो अक्षय तीर्थ के किनारे हैं — उन भार्गव के लिए मंगल हो।
इस क्षेत्र से चार शाश्वत शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: भगवान के अवतारों में कोई भेद नहीं। परशुराम स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। फिर भी उन्होंने नृसिंह की तपस्या की। सभी अवतार एक ही परब्रह्म के रूप हैं। किसी भी रूप की उपासना उसी एक की उपासना है।
दूसरी शिक्षा: जो क्षण अमर होने योग्य हो, भगवान उसे अमर करते हैं। परशुराम ने उस क्षण को देखा। प्रार्थना की। भगवान ने स्वीकार किया। वह क्षण 1500 वर्षों से अमर है।
तीसरी शिक्षा: एक दर्शन भी जीवन बदल सकता है। उस गणिका का जीवन केवल एक दर्शन से बदल गया। लंबी साधना की आवश्यकता नहीं। सच्चे मन से एक दर्शन पर्याप्त है।
चौथी शिक्षा: अक्षय तीर्थ का जल सब कुछ शुद्ध करता है। वह तीर्थ जो कभी क्षीण नहीं होता, जिसमें परशुराम ने स्नान किया — उस जल में जो स्नान करे, वह शुद्ध हो जाता है।
उपसंहार: वह दर्शन जो परशुराम ने माँगा
परशुराम ने वह दर्शन माँगा जो उन्होंने नहीं देखा था। भगवान ने दिया। और उस दर्शन में हिरण्यकशिपु की दृष्टि परशुराम पर पड़ी। उस एक दृष्टि ने परशुराम के मन में वह प्रार्थना जगाई जो इस मंदिर को अमर बना गई।
"प्रभु, इसी रूप में यहाँ रहो।"
और भगवान रहे। 1500 वर्षों से अधिक समय से वह विग्रह यहाँ है। दशावतार उसकी प्रभाई पर उत्कीर्ण हैं। और प्रह्लाद उनके चरणों में हैं। जो भक्त आज इस मंदिर में आता है, वह उस क्षण के साक्षी बनता है जो परशुराम ने देखा था। और वह दर्शन आज भी वैसा ही है।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
मैं उन उग्र, वीर, महाविष्णु स्वरूप, ज्वलंत, सर्वव्यापी, भीषण किंतु कल्याणकारी नृसिंह को प्रणाम करता हूँ — जो मृत्यु के भी मृत्यु हैं।
स्रोत एवं संदर्भ: यह लेख arunraj.org, lightuptemples.com, ahobilamtours.com, templesinindiainfo.com तथा अहोबिलम स्थलपुराण एवं ब्रह्माण्ड पुराण के प्रमाणित स्रोतों पर आधारित है।